किस्सा शाही लक्कड़हारा

एक समय मे जोधपुर के रहने वाले जोधानाथ महाराजा थे और उसकी रानी का नाम रूपाणी था। उसकी कोई सन्तान नहीं थी। समय के साथ राजा ने काम-काज चलाने के लिए चार कर्मचारी छांट लिये। चारों को राज काज संभाल कर स्वयं तपस्या करने का विचार किया। राजा सुबह 4 बजे उठकर मन्दिर में जाकर भजन करता। दिन के 2 बजे भोजन करता था। उसके शहर में एक गरीब बणिया था। उसने तेल का व्यापार करके 500 रु. किसी साहूकार में जमा कर दिये। एक दिन उसे 100 रु. की जरुरत पड़ी। वह साहूकार के पास गया तो साहूकार ने इन्कार कर दिया। फिर बाणीया रोता-पीटता वापिस आया और सेठाणी से बताया। बणिया और उसकी पत्नी क्या बात करते हैं-

बेईमान होगे रै! गोरी, जिन्हैं साहूकार कहया करते ।।टेक।।

तृष्णा ना रोके तै रूकती, फिरै सै लालच के मै झुकती,
वे नर मुक्ति टोहगे रै! गोरी, जिन्हे आरमपार कहया करते।।।1।।

छोड़ दी धर्म रुप की रूह, झूठे ठाले नेम-धर्म और सूं,
वे सब मुंह दबकोगे रै! गोरी, जिन्हें साचे यार कहया करते।।2।।

अपणी सौचैं नही पराई, जमां रखलें सैं धरी-धराई,
वे नर करी-कराई खोगे रै! गोरी, जिन्हें इज्जतदार कहया करते।।3।।

लखमीचन्द हुई अनशर्ती, पाप तै कापण लागी धरती,
वें तरती नावैं डबोगे रै! गोरी, जिन्हें पैसे मार कहया करते।।4।।

फिर बणिया और सेठाणी ने व्याकुल होकर राजा को रिपोर्ट लिखाई। साहूकार भी उसे कचहरी में मिला और उसने रिपोर्ट नहीं लिखने दी। बणिया कचहरी के आगे ही बैठकर रोता रहा। दो बजे के करीब राजा आया और उसने बणिये को उठाकर हाल पूछा। बणिये ने राजा को अपनी व्यथा सुना दी। राजा ने कचहरी के अन्दर जाकर चारों कर्मचारी और साहूकार को वहीं पाया। राजा ने पूछताछ की तथा साहूकार के घर से सारा धन निकालकर लाने का आदेश दिया। राजा ने साहूकार का सारा रूपया कड़ाहे में डलवा दिया और पानी में रुपये गिरते ही तेल का तिरमिरा आ गया। बणिये को 500 रुदे दिए और अगले दिन पेश होने का कर्मचारियों को आदेशा दिया। राजा घर आया और उदास था। रानी ने उदासी का कारण पूछा। राजा ने कहा कि मेरे राज में कर्मचारी रिश्वत लेने लगे हैं। रानी ने कहा कि ऐसा नहीं है। और रानी राजा से क्या कहती है-

थारै किसनै या बात जचाई दिल मैं, सै कौण धर्म नै तोड़णियां ।।टेक।।

आज तेरी किसतै होगी खटपट, मनैं तू भेद बतादे झट-पट,
तेरा लटलट बाग फूल-फल मैं, इसका कोए नहीं पात सरोणियां।।1।।

धरल्यो सच्चे ईश्वर का ध्यान, रहैगी बणी-बणाई श्यान,
चाहे सौ पुन्न-दान करो पल मैं, थारा कोए नहीं हाथ सकोड़णियां।।2।।

तुम व्याकुल होगे कैसे, बात का तन्त काढ़ल्यो ऐसे,
जैसे विष्णु नें सागर जल म्य, बुलवा लिए रई घमोड़णियां।।3।।

लखमीचन्द जिन्दगानी दिन दस की, मतन्या बांध पोट अपयश की,
मीठे रस की पींघ रही पाक गल म्य, इसका कोए-कोए शहद निचोड़णियां।।4।।

पति-पत्नी उस सेठ को अपने जमा पैसे के बारे याद दिलाते हैं और समझाते हैं-

तनै जगत कहै था धनवान, बता क्यां पै ध्यान डिगा लिया ।।टेक।।

बात सै थोड़े से अरसां की, जमां तै हो सै घणें वर्षा की,
या ना शाहपुरुषां की शान, उलटा दिया ना हाथ में जो आ लिया।।1।।

जाण के जमां धरयां करैं सैं, साहूकार के फिरया करैं सैं ,
बल्कि करया करैं सैं पुन्न-दान, जिसनै शरीर मनुष्य का पा लिया।।2।।

हमनैं जाण कै जमां धरी थी, नाटण की ना कती जरी थी,
मेहनत करी थी तोड़कै ज्यान, म्हारा धन क्यांकै लेखै ला लिया।।3।।

लखमीचन्द दिन सदा एकसे नहीं रहैंगे, पापी तरहां गहण की गहगें,
तनैं लोग कहैंगे बेईमान, धन कंगल्या का जो खा लिया।।4।।

अमानत के पैसे इन्कार करने पर पत्नी अपने पति को समझाती है-

पिया जाणदे, बस राहण दे,
खाणदे गरीब का धन, यो कीड़े पड़कै मरज्येगा ।।टेक।।

सारी मालूम सै उस हर नै, सजा दिया करै वो इसे नर नै ,
चाल पिया चालैगें अपने घर नै, उठकै, विष घूंटकै, लूटकै,
गरीब का धन, यो के पार उतरज्यागा।।1।।

चाल पिया क्यों लाव सै देरी, क्यों उनकै घालै रै घेरी ,
इसनै तै आत्मा मेरी और तेरी, मौसकै, भर रोश कै, खोशकै,
गरीब का धन, पेट के इसका भरज्यागा।।2।।

उसा-ऐ काटै जिसा बोवैगा, सदा दुख के झगड़े झोवैगा,
एक दिन मुहं पकड़ रोवैगा, हारकै, दुख डारकै, मारकै,
गरीब का धन, किस की खातिर धरज्यागा ।।3।

लखमीचन्द क्यों करै फिकर सै, तनै ना किसे बात का डर सै,
सब का रुखाला हर सै, दिल डाटकै, दिन काटकै, नाटकै,
गरीब का धन, अपणा उंट-मटीला करज्यागा।।4।।

राजा रानी में बहस के फलस्वरूप रानी को बनोवास की सजा मिल जाती है-

मतन्या त्यागों हो पिया, मनैं गर्भवती का विश्वास सै ।।टेक।।

मैं तनै भेद बतादूं जड़ का, कर लिए दूर जिगर का धड़का,
पंडित लोग बतावैं लड़का, छ: महीने की आश सै।।1।।

चैन पड़ण दे ना तृष्णा दुती, बीर तै हो सै पायां तले की जूती,
उड़ै कौण करैगा जापा-प्रसूति, ना नणद-जिठाणी सास सै।।2।।

तन पै चोट लागगी गहरी, ना मैं दीन-दुनी की रहरी,
बीर का झाड़-झाड़ सै बैरी, यो तै खोई तले का घास सै।।3।।

लखमीचन्द मैं सांस सबर के भरती, बण म्य मरज्यांगी डरती-डरती,
ऊपर रक्षक राम तलै धरती, ना कोए और दूसरा पास सै।।4।।

राजा नहीं माना और रानी चल पड़ती है। वन में एक ऋषि के आश्रम पर आकर रुपाणी क्या कहती है-

तेरी जगहां टोह ली, सब दुख रो ली, प्रलय सी होली,
बण मे फिरती-फिरती हार लई ।।टेक।।

ऋषि मेरी माड़ी सै तकदीर, दुख मैं व्याकुल होया शरीर,
मेरी बीर जात, ना हाथ बात, मै आधी रात,
छोड़ शहर हो नगरी तै बाहर लई।।1।।

ऋषि मनै मत राखण तै नाट्टो, यो मेरा बख्त कष्ट का काटो,
डाटो हे! ब्रह्मचारी, समझ सुता प्यारी, जैसे जनक दुलारी,
बाल्मीक नै पास बिठा पुचकार लई।।2।।

मैं कहै रही सू बात मरहम तै, दुनियां के में सिवा धर्म तै ,
कर्म तै ओट नहीं, बड़-छोट नहीं, मेरा खोट नहीं,
जले नै कर घणे ठेढ़ की कार लई।।3।।

कहैं लखमीचन्द बैठगी होल, जगत मै बणी-बणी का मोल,
छन्द तोल धरे, सन्तोष करे, वै पार तरे,
जिन्हें तृष्णा ममता मार लई।।4।।

रूपाणी लकड़ी उठाकर सोचती हुई शहर की तरफ चलती है-

सिर पै भरोटा धर लिया, चली रुपाणी नार,
आग बुरी पेट की हो सै ।।टेक।।

छूट गये राज अमीरी ठाट, करी हौणी नै बारा बाट,
काट लादड़ा कर लिया, हुई गर्मी म्य लाचार,
धूप बुरी जेठ की हो सै।।1।।

मिटै ना छाती का दुख दर्द, लागरी सीने के म्य कर्द,
वो मर्द जल्या निस्तर लिया, जो करै बहूँ नै घर तै बाहर,
कार घणे ढेठ की हो सै।।2।।

बण में गुजर गए कई मास, पति नै आप दिया बनोवास,
सांस सबर का भर लिया, रानी रोई जार-बेजार,
बात अलसेट की हो सै।।3।।

गुरु मानसिंह काटै फन्द, कद हो सुख और मौज-आनन्द,
सोचकै गोबिन्द सुमर लिया, जब होणी करै खंवार,
आबरु के सेठ की हो सै।।4।।

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के इद्रानीं के ब्रहमाणी, के बिन पाणी, डूब्बा पड़गी, हे! लकड़हारी ।।टेक।।

तूं दिये खोल शरीर की तिस नै, बाहण के पीकै मरगी विष नै,
तूं किसनै पाली, खूब संभाली,
नागण काली, लड़गी, हे! डंक ठारी।।1।।

मै समझाऊं आप तनै, रोये तै ना बात बनैं,
मनै कुछ ना भाता, हे! मेरे दाता,
बैरण बे-माता, घड़गी, हे बैठ न्यारी।।2।।

दुःख-बिपता की ताली बजली, क्यूंकर मेर कुटम की तजली,
जाणू बिजली घन मैं, सूरज दिन मैं,
एकली बन मैं, लाली झड़गी, हे! दुख की मारी।।3।।

कहै लखमीचन्द मन्दी बोल्लै, क्यूं ना दिल की घूण्डी खोल्है,
पड़दे ओलहै रहया करती, इब पड़ती गिरती,
फिरती-फिरती, श्यान बिगड़गी, हे! दुख भारी।।4।।

रुपाणी क्या जवाब देती है-

मै दुखिया भूखी टूक की, ना चाहती धन माल,
ल्यो कोए लाकड़ी ल्योम मोल ।।टेक।।

मै बणखंड म्य विपत भरूं सूं , भूखी टुकड़े तलक मरूं सूं ,
मै सताई फिरूं सूं भूख की, गई सुकड़ बदन की खाल,
उतरग्या मुंह बटवा सा गोल।।1।।
मनै या कार रोज की पकड़ी, काया दुख-विपता नै जकड़ी,
यें लकड़ी सूखे रूख की, लियो हंस-हंस के बोल,
पाटज्या बालती बरियां तोल।।2।।

मेरे पति नै दुख दे दिया किसा, मैं भोगूंगी कर्म लिखा लिया जिसा,
तेरे कौण दिशा माशूक की, गई भूल पहलड़ी चाल,
न्यू तन होग्या डामा डोल।।3।।

लखमीचन्द विपत की फीणी, दुख-दर्दा नैं सहकै जीणी,
कदे तै हीणी थी म्य कूख की, आज किसे टोटे में लाल,
किस्मनत तेरा किसा मखोल।।4।

अब रुपाणी क्या जवाब देती है-

दुख म्य बीतै जिन्दगी न्यूं दिन-रात दुखिया की,
के बुझैगी रहाण दो, बस बात दुखिया की ।।टेक।।

के बूझो छाती मैं घा सै, बोलतैं-ऐं ह्रदया पाटया जा सै,
और दूसरा ना सै, दुख में साथ दुखिया की।।1।।

मेरा ना किसे चीज म्य मोह सै, कुछ भी नहीं जिगर मैं धो सै,
टोटे मैं के इज्जत हो सै, के जात दुखिया की।।2।।

या होणी अपणें बल हो सै, घात मै सब तरियां छल हो सै,
दुख मैं निष्फल हो सै, जो करामात दुखिया की।।3।।

लखमीचन्द कहै बेदन जगी, मै धोखे में गई ठगी,
थारे संग मैं कैसे हौण लगी, मुलाकात दुखिया की।।4।।

अब वे स्त्रियां क्या कहती हैं-

नित आया कर, हंस खाया कर, ले ज्याया कर, तू टुकड़ा-पाणी हे ।।टेक।।

कितना बुरा होया तेरे साथ, दुख मै भरया फूल सा गात,
बात कहदे सारी, सुण ले म्हारी,
ना तू लकड़हारी, जैसे कोये रानी हे।।1।।

रूप का किसा दीवा सा चस्या, याणा जोबन मन मै बस्या,
तेरा किसा पति, ना अकल कती,
इसी नार सती, की कदर ना जाणी हे।।2।।

न्यू क्यूं बेचती लकड़ी डोलैं, तू ना भेद बात का खोलैं
बोल्लै आंसू भरकै, किसी डर-डरकै,
मेहनत करकै, रोटी खाणी हे।।3।।

गुरु मानसिंह को शीश झुकाकै, लखमीचन्द कहै छन्द गाकै ,
आके फेटी, तृष्णा मेटी,
तेरे किसी ढेठी, ना और बीरबानी हे।।4।।

रानी बीमार होने पर क्या कहती है-

बेमारी नै यें घर घाले, रुपाणी कै ताप चढया ।।टेक।।

कोए दिन रहया ऋषि का भर्म, वैं गए गुजर फूट गए कर्म ,
उस ब्रह्मचारी नै, यें घर घाले, इस दुख ठाणी कै ताप चढया।।1।।

बेटा तेरी चन्दा कैसी सूरत, पेट भरण की मिटी ना जरुरत,
तेरी मूरत प्यारी नै, ये घर घाले, तेरी मां स्याणी कै ताप चढया।।2।।

होणी ला रही हेरा-फेरी, मैं कर दूंगी शरीर की ढेरी,
मेरी किस्मत हारी नैं, ये घर घाले, मुझ मरज्याणी कै ताप चढया।।3।।

यें छन्द लखमीचन्द नै टेरे, मनै ला लिये जंगल म्य डेरे ,
पिता तेरे अहंकारी नै, यें घर घाले, आज महारानी कै ताप चढया।।4।।

रुपाणी बीमारी में अपने लड़के को क्या कहती है-

रुपाणी कै ताप चढया, मनैं खतरा सै बेमार हुई,
तेरे क्यूकर लाड करूं बेटा, मैं बोलण तै लाचार हुई ।।टेक।।

सबनै दिया भूप का साथ, मेरी ठोस्या मैं रलगी बात,
आधी रात लिकड़ कै चाली, वो जीत गया मेरी हार हुई,
सब राजमंत्री खड़े लखावें, मैं तुरन्त शहर तैं बहार हुई।।1।।

पूत नै जाणूं लेज्यां गैल सजा कै, कुछ ना चालै आगै जोर कजा कै,
चिट्ठी लिख दई बान्ध भुजा कै, लिया सम्भाला होशियार हुई,
तेरी रुपाणी कै एक पूत था, ना दो-च्यारा की लार हुई।।2।।

यो जल्या देह की गेल दुख मोटा, कुछ मेरा याणां बालक छोटा,
तनै बारा साल का दिया दसौटा, तेरी बड़ी कृपा भरतार हुई,
तनै धर्मराज कै तैयार मिलूंगी, जै मैं पतिभ्रता नार हुई।।3।।

लखमीचन्द किस्मत की माड़ी देखी, खिली हुई ना फुलवाड़ी देखी,
जब हाथ पकड़कै नाड़ी देखी, वा बिना जीव बेकार हुई,
पूत रोवता छोड़ दिया, खुद भवसागर तै पार हुई।।4।।

बात करते-करते थोड़ी देर में रानी स्वर्ग सिधार गई। रानी रुपाणी मरते समय एक कागज पर सारा हाल तथा लड़के का सब पता लिखकर उसकी बाजू पर तबीज बाँध गई थी। भगवान ने लड़के को होंसला दिया। अब लड़का माता की तरह लकड़ी तोड़कर माधोपुर शहर में बेचने के लिए जाता है। लकड़हारा अपनी किस्मत को रोता है और क्या कहता है-

माणस की के पार बसावै, जब हर की माया फिर ली,
के जीवै एकले का बण म्य, जब बालक की मां मर ली ।।टेक।।

नाम-गाम और पिता वंश का, मतलब खोल्या सारा,
रुपाणी नै हाल खोल कै, लिख दिया न्यारा-न्यारा,
मै तै मारी होड़ जली नै, तू लाल राम नै मारया,
चिट्ठी लिख दई बान्ध भुजा कै, पाछै स्वर्ग सिधारया,
मां नै बेटा रोवण लाग्याज, जब कती मरण की जर ली।।1।।

माता कद की बैरण थी, तनैं बैर कदे का लिया,
तू तै स्वर्ग सिधार चली, पर दुख बेटे तै दिया,
कई दिन हुए रोटी ना खाई, पाणी भी ना पिया,
मात-पिता के लाड करे बिन, के जीणे मैं जिया,
फेर रोवण का ख्याल छोड़ कै, घूंट सबर की भर ली।।2।।

न्यू मैं भी जाण गया के, कर्मा का हेठा सूं,
बिजली भी ना पड़ती, मैं मां का सुत जेठा सूं ,
मरण तै आगै और के होगा, इतना तै ढेठा सूं,
लड़के नैं न्यू जाण नहीं थी, मैं राजा का बेटा सूं ,
ताज धरण के सिर कै उपर, तोड़ लाकड़ी धरली।।3।।

दोनू बख्त सतावैं सबनैं, लागे भूख जिगर मैं,
इन्द्री पांच कमावण खातिर, हर नै लादी नर मै,
मात-पिता भाई-बन्ध ना, अन्न का टोटा घर मैं,
तोड़ लाकड़ी बेचण खातिर, जा पहुंचा माधोपुर मैं,
लखमीचन्द कहै बोझ तलै, करडी छाती करली।।4।।

अब सिर पर लाकड़ियों का भरोटा उठाया और माधोपुर शहर की तरफ चलता-चलता क्या सोचता है-

कौण सुणैगा मेरे जिकर नै, लाकड़ियां के फिकर नै,
की ढेरी, मेरी गेरी, विपत हर नै ।।टेक।।

लाकड़ियां के ल्याये बिना, कमाए और खाए बिना,
ना सरता, फिरता भरता, सहम पराए घर नैं।।1।।

विपता की बुरी रोण सै, मेरै दुख की सुणनियां कौण सै,
चला भाई, पाई राही, माधोपुर नै।।2।।

मै भूखा प्यासा मर लिया, बांध-जूड़ सिर धर लिया,
भरोटा, टोटा खोटा, झुकादे सर मैं।।3।।

कहै लखमीचन्द छन्द धरण तै, इसी मजदूरी करण तै,
हो सिद्ध काम, तमाम राम, ठाले मुझ दुखिया नर नै।।4।।

माधोपुर शहर में राजा रायसिंह राज करते थे, उनकी दो पुत्री थी। बड़ी का नाम बीना तथा छोटी का नाम बेला था। बीना व बेला दोनों जवान हो चुकी थी। बीना उस समय पढ़ रही थी व सखियों ने जाकर बीना से कहा कि बहन चलो बाग में झूलने के लिए चलोगी तथा उसकी सारी सखी बीना से क्या कहने लगी-

कागज मैं सिर मारै बीना, खाणा पीणा छूट ज्यागा,
आपस के म्हा रहैगी लड़ाई, मेल-मुल्हाजा टूट ज्यागा ।।टेक।।

तेरै गडती ना एक सूम कै, मोह ना लतै बीच टूम कै,
लिया देख घूम कै सारै हे! बीना, बिन बालम जोबन लुट ज्यागा।।1।।

न्यूऐ क्यूं सहम म्य जिन्दगी खोती, एक-2 दिन रोज उमर कम होती,
रहै मोती पड़या किनारे हे! बीना, हंस बटेऊ उठ ज्यागा।।2।।

बहोड़िया तू बणकै जागी जिनकी, उनतै जै ना बतलावैगी मन की,
तेरे तन की खाल उतारै हे! बीना, जो तेरी जोड़ी के म्हां जुट ज्यागा।।3।।

लखमीचन्द कहैं छन्द धर-धर, शौक मेरी काम करया कर डर-डर
ना तै भर-2 आंसू डारै हे! बीना, जवानी का घूट ज्यागा।।4।।

बीना ने चलने से बिल्कुल इन्कार कर दिया, तब बेला और सखियां क्या कहती हैं-

सारी सखियां बोलैं चालैं, रंग चा की बात करी,
हे! बेहूदी बीना, बहोत गुमान भरी ।।टेक।।

खेल कूद म्य सबका साझा, तूं क्या तै डर री सै,
बालक सी की मां मरगी, के रोसे में भर री सै,
बेरा ना तू के कर री सै, पाटी ना जाण तेरी।।1।।

रात दिनां का पढणा-लिखणा, काम बुरा निज का,
ओढ पहर कै सुथरी लागै, बिजली केसा बिजका,
तलै घाघरा बावन गज का, रेशम की चुंदड़ी हरी।।2।।

हम चाहवैं दो घड़ी खेल ले, तनै एक नहीं मानी,
तेरे केसी बेहूदी, ना और बीर बानी,
हे! चन्द्रमा सी सुथरी श्यानी, क्यूं डिब्बे म्य रोक धरी।।3।।

लखमीचन्द सतगुरू सेवा बिन, हाडें जा बाहर-बाहर कै,
लिखण पढण के धन्धे म्य, पिंजर हो हार-हार कै,
कागज मैं सिर मार-मार कै, न्यूए मज्यागी शौक मेरी।।4।।

बेला की बात सुनकर बीना क्या कहने लगी-

है तेरे दिल बिगड़न की बात, हट कमजात,
तू दिन-रात, बदी पै चालती हे ।।टेक।।

तू कहरी सै बोल गुमर का, तनै बेरा ना हरी सुमर का,
बुरी करण तै भली उमर का, तनै कर लिया सत्यानाश, हट बदमाश,
हान्डै् क्यूं सांस, सबर के घालती हे।।1।।

भला होया ज्ञान राम नै ना दिया, क्यूं तनै बिघन बाड़ मैं पां दिया,
तनै ला दिया, कुल कै दाग, हे! निरभाग,
हांडै आग, फूंस मैं बालती हे।।2।।

सहम कररी जिन्दगी का धेला, एक दिन उड़ज्यागा हंस अकेला,
तू बेला घणी नादान, तनै ना ज्ञान,
तू बेईमान, हांसियां मैं टालती हे।।3।।

लखमीचन्द ना बात जरा सी, बाहण मतन्या समझै तू ठट्ठा-हांसी,
यू तेरी बदमाशी का लोभ, दे तनै डोब,
कचिया गोभ, टूटज्यागी हालती हे।।4।।

अब सारी सखी सहेली बाग में पहुंच जाती है और सैर करने लग गई। तब बीना ने क्या कहा-

आओ हे! सखी सब गैल, चलो बर देखैं जोड़ी का,
बाग में आ रया सै प्रदेशी ।। टेक।।

ओढ़-पहर मस्ती म्य भरैं, जमी पै पैर ठहरकै धरैं,
जुल्फ करैं नागिन जितणा फैल, नहीं सै बिसर मरोड़ी का,
लगाल्यो दांतां पै मेषी।।1।।

मनै सै एक बात का खतरा, आदम मनुष्य जन्म ले उतरा,
हे! किसा सुथरा माणस छैल, चढणियां असली घोड़ी का,
श्यान कहैं चन्द्रमा केसी।।2।।

बितैगी जो लिखी भाग की, नागणी जोड़ी चाहवै नाग की,
आग्या करण बाग की सैल, उमर मेरे जितणी थोड़ी का,
पड़ी सै कान्धे पै खेशी।।3।।

गुरु मानसिंह बात कहैं धुर की, मुश्किल खबर पटै लयसुर की,
कर लखमीचन्द सतगुरु की टहल, गाहक बण माल करोड़ी का,
काटदे संकट की पेशी।।4।।

कहानी नै मोड़ लिया किसी सर्वमान्य बात पर राजा बड़ी लड़की बीना से नाराज हो जाता है। अपने सिपाहियों को कहता है कि बीना के लिए सबसे गरीब भिखारी किस्म का कोई लड़का तलाश कर लाओ। राजा बीना के भाग और सतित्व की परीक्षा करना चाहता था। राजा के कर्मचारी गरीब लकड़हारे को पकड़ लाते हैं। वह लड़का सिपाहियों को क्या कहने लगा-

मै दुखिया फिरूं सूं कंगाल, मेरे तै के मतलब थारा,
पकड़कै कित ले जाओगे ।।टेक।।

एक सेठ पै ले लिए दाम करारे, एक नुक्ते पै आए कर लिए सारे,
कुत्ता बणजारे की ढाल, बांच कै परवाना सारा,
मार कै फेर पछताओगे।।1।।

मारो तो ज्यान मारियो उसकी, जड़ै माया दबरी हो कंजूस की,
जिसकी पूंजी तै कई साल, बांट कै धन भाईचारा,
उमर भर बैठे खाओगे।।2।।

वरूण पै तै सुत उधारा लिया, ना मौके पै उल्टा दिया,
किया हरीचन्द नै जबर कमाल, मारणा ब्राह्मण सुत धारया,
उसी के मेरी बली चढ़ाओगे।।3।।

लखमीचन्द यो स्वाद जीभ का, बोल मेरा आवैगा याद इब का,
बख्श दयो करकै गरीब का ख्याल, दुखी मैं तैं दुनियां तै न्यारा,
मारकै के फल पाओगे।।4।।

अब राजा के नौकर लकड़हारे से क्या कहने लगे-

मेरे यार जनाने महलां मैं, कहकै ठहरवावैंगे,
चल चाल चुपचाप, नहीं तै जी तै मरवावैंगे ।।टेक।।

घड़ी टालें तै नहीं टलण की, समय हाथां जंजीर घलण की,
आगै वंश चलण की साफ, नींव कहकै धरवावैंगे।।1।।

हमनै दुनियां मैं ठोकर खाली, पर तेरे जैसी ना पदवी पाली,
यो तेरी कंगाली का प्रताप, चाल तेरा ब्याह करवावैंगे।।2।।

क्यूं आग्या तेरे गात पसीना, तनै भाग लिखा लिया हीणा,
कर बीना तै मेल-मिलाप, तेरे फेरे फिरवावैंगे।।3।।

करो हित-चित से सेवा शुरु, ज्ञान म्य होगे पार ध्रुव,
मानसिंह गुरु करैं हरी का जाप, तेरी डूबती नाव तिरवावैंगे।।4।।

अब राजा के नौकरों ने कहा कि हम धन लुटने वाले लुटेरे नहीं है। हम राजा के नौकर हैं, घबराओ नहीं। तुम हमारे साथ चलो तुम्हारी शादी करवायेंगे। राजा के नौकर लकड़हारे से उसके घर का नाम पूछने लगे तो क्या जवाब दिया-

मेरा नाम नहीं, कोए धाम नहीं, घर-गाम नहीं,
बण मैं एकला ।।टेक।।

मैं नित भूखा-प्यासा मरू, रात-दिन न्यूए जंगल मैं फिरूं,
करूं कोए फैल नहीं, करूं टहल नहीं, मेरै कोए गैल नहीं,
मैं बण मैं एकला।।1।।

लेता बणखण्ड की खश्बोई, किसे की ना करता बिगदोई,
कोई मेरे साथ नहीं, सुखी गात नहीं, मेरै जात नहीं,
मैं बण मै एकला।।2।।

मैं नित डरता पाप विषय तै, दुख भोगूं दिनां-निशे तै,
किसे तै प्यार नहीं, तकरार नहीं, कोये यार नहीं,
में बण में एकला ।।3।।

लखमीचन्द आगे की चेत, न्यूए कर लिया शरीर का रेत,
खेत बिन बरू नहीं, रंग शुरू नहीं, मैं बिन गुरु नहीं,
बण में एकला।।4।।

*बिदगोई= बुराई, दिनां निशे= दिन रात

निर्धन के साथ शादी करने से बीना ने कोई दुख महसूस नहीं किया और खुश होकर लकड़हारे के साथ चली। घर से चलते समय बीना ने छन-कंगण अपने साथ लिया और केवल बेला से ही मिलती है। बीना को कोई विदा करने के लिए भी नहीं आई। चलते समय बीना अपनी बहन बेला से क्या कहने लगी-

जीवती रही तै फेर मिलैंगी, मेरी बहाण उरै हो पुचकार दयूं ।।टेक।।

हे! सुण बहना मौसी जाई, आज मैं होली गैल पराई,
मैं न्यू सोचूं थी ब्याजही साथ चलैंगी, सब बेला नै अख्तयार दयूं।।1।।

मैं ईसा चाहू थी मन मेला, हम दो होती पति अकेला,
बेला के सब टूम खिलैंगी, अपणां भी सौंप सिंगार दयूं।।2।

एक तै प्रीतम की प्यारी मैं, दूजै तेरी इन्तजारी मैं,
तेरी यादगारी मैं आसू रोज ढलैंगी, गाली प्रेम की एक हजार दयूं।।3।।

लखमीचन्द ढंग मेरी निगाह मैं, तनै देख भरी रंग-चा म्य,
तेरे ब्याह म्य बुलाई तै के कसर घलैगी, मै भी हीरे-रतन जवाहर दयूं।।4।।

बेला अपनी बहन बीना को विदा करते समय क्या कहती है-

हंस-फिरे बिना, तेरा मेरे बिना, मेरा तेरे बिना,
जी लागण का कोन्या ।।टेक।।

कहै बचनों से नहीं हिलूंगी, करे प्रण मैं नहीं टलूंगी,
तेरे चलूंगी गैल, कदे ना करूं फैल, नित करूंगी टहल,
इसा मेल हसंणी-कागण का कोन्या।।1।।

बहाण तेरा रंग रहै था म्हारे तन मैं, राजी रहया करै थी मन मैं,
थी धन म्य गर्क, कदे दिया ना दर्क, जैसे फर्क,
बीण और नागण का कोन्या।।2।।

जै मेरा दिल मिलण नै चाहवै, मनैं किस मौके पै पास बुलावै,
मेरै जब आवैगा सबर, मेरी तू लेगी खबर, इसा भाग जबर,
मुझ निर्भागण का कोन्या।।3।।

चार कली लखमीचन्द नै कही, मनै के जीवती छोड़ गई,
रही तड़फ लाश, गया टूट सांस, मरूं पास,
दुगाड़ा दागण का कोन्या ।।4।।

*दुगाड़ा = दुनाली बन्दूक

अब बीना अपने सारे परिवार को छोड़कर लकड़हारे के साथ चल दी। थोड़ी दूर जाने पर लकड़हारा बीना से, कहने लगा कि तू किसके साथ आ गई मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। तू वापिस अपने घर चली जा। लकड़हारा बीना से क्या कहता है-

गरीब आदमी निर्धन बन्दा, धन-पैसे बिन खाली,
आगे जाणै के-के दुख होगा, तू किसकी गेल्यां चाली ।।टेक।।

उस गोरी का के जीणां हो, जिसका बालम छोटा,
पौणा पीहर सांसरा डयोढा, जब हो महर-मलोटा,
न्यू तै मैं भी जाण गया, तनै भाग लिखा लिया खोटा,
इसे मर्द तै मेल किसा, जित अन्न-वस्त्र का भी टोटा,
मैं फिरू दलदरी तू बेमाता नै, घड़ी बैठ कै ठाली।।1।।

जो जाण बूझ दुख दे बेटी नै, ओ बाबुल श्याणां कोन्यां,
मै फेर कहूं सूं घर नै चली जा, कुछ धिंगताणां कोन्यां,
नाम-गाम और जात मेरी का, मतलब जाणा कोन्यां,
मैं बेवारिस फिरूं बणा मैं, ठोड़-ठिकाणा कोन्यां,
मैं न्यू रोवूं तेरा बाप डूबग्या, तू कंगले के संग घाली।।2।।

बेटी का फर्ज बाप के जिम्मै, लायक वर देखण का,
उल्टी फिरज्या मौका सै, यू गुप्त जख्म सेकण का,
रानी का के काम सेज तै, पैर तलै टेकण का,
जाण बूझ के भाग फोड़ दिया, छाती के ढेकण का,
तू बिन जाणे चा म्य भरकै, बनड़ी बणगी ब्याटहली।।3।।

साची बात बख्त पै कहदे, इसमें के चोरी हो,
चोरी कर ठोड़ ठिकाणै, एक लिकड़ण की मोरी हो,
ब्याीह तै आच्छा जब लागै, धन माया की बोरी हो,
घोड़ा-जोड़ा कड़ा-दुशाला, जब संग में गोरी हो,
लखमीचन्द कहै ब्याह ना बणता, जब राखै दुखी कंगाली ।।4।।

कुछ समय पश्चात् डाकू जालम सिंह और विजय सिंह राजकुमारो का भेष करके राजा रायसिंह के बाग में आ जाते हैं। राजा राय सिंह अपनी दूसरी बेटी के लिए किसी अच्छे राजकुमार की तलाश में थे, पड़ोस के राजा के राजकुमार इसी काम के लिए बाग में बुलाए हुए थे। राजकुमारों का आना वास्तविक जानकर बेला अपनी सहेलियों के साथ बाग में आती हैं और दोनों डाकू बेला को उठा लेते है। अपने भोरे में बन्द कर लेते हैं-

स्याही घालो, बदन सजा लो, रल मिल चालो, सारी हे ।।टेक।।

मद जोबन का बजा लिया ढोल, पड़ती ओली-सोली झोल
थारा बोल अंगेजू, प्यारी कर भेजूं, पाटड़ी रस्सी-नेजू,
ले लो सारी हे।।1।।

चालै बाल जब आवै जी सा, मद जोबन का बरसै मीह सा,
काया में घी सा घलग्या, दीपक बलग्या, रुप जाणूं खिलग्या,
फूल हजारी हे।।2।।

इसमें काम नहीं सै धो का, म्हारा-थारा साथ बणै चौखा,
क्यूं मौका उको, रंग म्य चूको, कालजे नै फूको,
दबी अंगारी हे।।3।।

कुछ चालण का करियों ढंग, आज काया मैं भरया उमंग,
मानसिंह कर कार आनन्द की, काटो फांसी यम के फन्द की, लखमीचन्द की,
रंगत न्यारी हे।।4।।

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राम जी के हाथ बात, साथ में लुगाई, आई गैल बेला गोरी सै ।।टेक।।

दुर्गे सब के काज सारती, इसे बन्दया नै जमी पै तारती,
मारती खड़ी घूर दूर, हूर तै ले फेरे, तेरे हाथ के म्हा डौरी सै।।1।।

रूप जाणै चढ़रया चान्द शिखर मैं, हम खा लिये सै इनके फिकर नै,
जिकर नै दे खोल बोल, घोल दे विष, रस म्य इब क्यां की चोरी सै।।2।

यें सिंगर आई पहर औढ कै, हम बस होगे इश्क कोढ कै,
छोड़ कै घरबार नार, त्यार सै हो तजकै, सज कै बिजली सी होरी से।।3।।

लखमीचन्द विधि मोह बिन की, जोड़ी सजती ना दो बिन की,
मद जोबन की पाक साक, लायक सै हमारे आंख, फांक सी लकोरी से।।4।।

सखियां क्या कहती हैं-

तेरे वर के लायक नहीं सैं हे! बेला, यें बुढे-ठेरे उमर पुरानी के दोनों ।।टेक।।

रन्धीा हुई का के रान्धै गी, कैसे इश्क तीर साधैगी,
तू किस तरिया बान्धैयगी, तेरे सिर के लायक नहीं सै हे! बेला,
सेहरा पेची बेमिजानी के दोनों।।1।।

तू ले नै म्हारे समझ इशारे, इनके ढंग दीखैं सै न्यारे-न्यारे,
थारे, घर के लायक नहीं सै हे! बेला,
किसे ऊत-रांड गिरकाणी के दोनों।।2।।

तू बुरे कर्मां पै नीत धरै सै, यैं बुरे कर्मां तै नहीं डरैं सैं,
यें लुच्चे बेईमान फिरें सै, तेरी सूरत इस नर के लायक नहीं सै हे! बेला,
ये लागू चीज बिरानी के दोनूं।।3।।

लखमीचन्द कर दूर अन्धेरे, लाहरे म्हारे बांगा म्य डेरे,
तेरे, सफर के लायक नहीं सै हे! बेला,
ये टुट्टे गाड्डे बिना ठिकाणी के दोनूं।।4।।

*ठिकाणी= गाड़ी में पहिए और बैल के बीच की लकड़ी को ठिकाणी (फड़) कहते हैं।

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मेरी प्यारी नारी, कुवारी रहया नहीं करते ।।टेक।।

तनै मार गिराऊंगा ज्यान तै, किसा बाहर लड़ैं अनुमान तै,
बिन पोटी छोटी, खोटी कहया नहीं करते।।1।।

तू बालक सै तनै के शर्म सै, जुणसा बीरां आला धर्म सै,
उस घर तै डर तै, बर तै फहया नहीं करते।।2।।

तेरी मेरे हाथ म्य डोर सै, हम तनै ठाकै लयाऐ जोर सै,
दुख दारूण कारण, मारण की हम दया नहीं करते।।3।।

तेरी आखिर नै बीर की जात सै, तेरा छोटा मुंह और बड़ी बात सै,
कहै लखमीचन्द मुखड़ा सुखड़ा, दुखड़ा सहया नहीं करते।।4।।
जोड़ी चाहवै नाग की,
आग्या करण बाग की सैल, उमर मेरे जितणी थोड़ी का,
पड़ी सै कान्धे पै खेशी।।3।।

गुरु मानसिंह बात कहैं धुर की, मुश्किल खबर पटै लयसुर की,
कर लखमीचन्द सतगुरु की टहल, गाहक बण माल करोड़ी का,
काटदे संकट की पेशी।।4।।

जब दोनों डाकू बेला को पकड़ लेते हैं तो वह उन डाकूओं को क्या कहती है-

तनै कोड करी, दिये छोड मरी, काली गऊ सू तेरी,
तू मेरे बाप बराबर सै ।।टेक।।

मैं के किसे जाये-रोए के घरां गई थी, मति मेरे बाबल की फिर गई थी,
बाग में आते ही जर गई थी, तुम देखले ना बदी तै टले,
हट छोड जले, मनैं इज्जत का डर सै।।1।।

पता जब मेरे बाबल नै पाटै, चिट्ठी रजपूतां म्य बांटैं,
जले थारे मिलते ही सिर नै काटै, जब अवैगा सबर, तुम नै पाटेगी खबर,
तुम हीणे वो जबर, म्हारा रजपूतां का घर सै।।2।।

थारै यो ना एैब छिपाया छिपणा, होज्याप थारी ज्यान का खपणा,
मनै तुम काल समझ लियो अपणा, लगी समझावण, विधि बतावण,
मत ले रावण, या ऋषियां की कर सै।।3।।

लखमीचन्द पर्ण किसे बांधे, क्यूं जले बिना खाण की रान्धेा,
कवारीपण मैं मर्द के कांधे, मै ना चढती रंजिश बढती,
तेरै ना गढती, या समझणियां की मर सै।।4।।

बेला जालिमसिंह से क्या कहती है-

अरे! तेगा लेकै रे पापी मारै नै, मै आप मरण नै त्यार ।।टेक।।

करै कवारी कन्या तै ठल्ला, तेरा कद लग ना मानूंगी गिल्ला,
पल्ला भे-भे कै रे पापी, नैनां पुछूं जल की धार।।1।।

पहलम सांस काढ मेरे घट का, लागै नहीं अणी का अटका,
झटका देकै रे पापी, तेगे नै करदे आरम-पार।।2।।
मेरा धड़ तै सिर बेशक कटज्याप, मरे तै जिन्दगी का सांटा सटज्याी,
ना तै हटज्या खाकै रे पापी, नुकते पै तनै दूंगी गाल हजार।।3।।

लखमीचन्द भजन कर हर के, कर्म फिर पास रहें ना डर के,
क्यों सिर के ऊपर टेकै रे पापी, कुवारी कन्या का मोटा भार।।4।।

बेला को डाकू उठा लेते हैं। अपने भौरे में बन्द कर देते हैं। उधर शाही लकड़हारा बीना को जंगल में रहने के दुख समझाता है। वापिस अपने घर जाने की सलाह देता है-

तू सुणती नहीं गरीब की, फेर पाछै पछतावैगी ।।टेक।।

बण म्य दुख पावैगा गात, चली कंगले के साथ,
बात मेरी याद राखिए इब की, धरती पै बिस्तर लावैगी।।1।।

श्यान जाणूं लिकड़ी पत्थर नैं फोड, तेरा-मेरा मिलता कोन्यां जोड़,
फूटे ओड़ नसीब की, चल बण म्य दुखड़ा पावैगी।।2।।

मनै यें बात बतादी सारी, गिण-२ न्यारी न्यारी,
टोटा बीमारी पीब की, दवा कड़े तै मंगवावैगी।।3।।

लखमीचन्द धर्म की डोरी, टूटैगी टूटण नै होरी,
तूं होगी चटोरी जीभ की, उड़ै तर-तर जबां चलावैगी ।।4।।

अपने पति के मुख से वचन सुनकर बीना क्या कहती-

चन्द्रमा सी प्यारी लागै, भोली-भाली श्यान तेरी,
खटका छोड नफे-टोटे का, तू मांगै तै या ज्यान तेरी ।।टेक।।

पिता नैं मैं छोड़ी ना क्याहें जोगी, सजन में वैद्य बणू तू रोगी,
देख लिए कोए दिन म्य होगी, दुनियां के म्य मान तेरी।।1।।

बहुत दिन तक खेली तीजण मै, सजन मै सेर मिलूंगी तुझ मण मैं,
मत घबरावै बालकपण मै, गेल्यां बहू जवान तेरी।।2।।

पिया मत गैर समझकै त्यागै, जोड़े मैं हाथ खड़ी तेरे आगै,
मनै तू राम बराबर लागै, बेशक उमर नादान तेरी।।3।।

कहै लखमीचन्द घिर लूंगी, घूट सबर की भर लूंगी,
इतणे मै भरपाये करलूंगी, उमर लगाओ भगवान तेरी।।4।।

बीना की बात सुनकर लकड़हारा क्या कहता है-

करकै याद राज के सुख नै, आंसू तै मुंह धोया करिये,
पलंग-गलीचे नहीं बिछाण नै, धरती के म्हा सोया करिये ।।टेक।।

दिखै दिन म्य घोर अन्धेरे, लाणें हों धरती मैं डेरे,
उड़ै बण मैं बोलैं शेर-भगेरे, डर-डर जिन्दगी खोया करिये।।1।।

क्यूं ना छोड़ै अपणी बाण नै, उड़ै एक तला सै न्हाण नै,
तनै 36 भोजन मिलै थे खाण नै, इब निरे चणया की पोया करिये ।।2।।

धोरै कोन्या पैसा-धेली, संग आई तू नई-नवेली,
आड़ै नहीं कोए मन का मेली, एक लिए थूक बिलोया करिये।।3।।

लखमीचन्द कहै छन्द नै गाकै,तू के राजी होरी ब्याह करवाकै,
तनै सीख तलक ना देखी ठाकै, मेरी गैल लाकड़ी ढोया करिये।।4।।

बीना की बात सुनकर लकड़हारा उसको फिर समझाता है कि तू जंगल में अकेली नहीं रह सकेगी और क्या कहता है-

मत चालै मेरी गैल, तनै घरबार चाहियेगा,
मैं एक निर्धन कंगाल, तनै परिवार चाहियेगा ।।टेक।।

लाग रहया कंगाली का नस्तर, शूरा के करले बिन शस्त्र,
तनै टूम-ठेकरी गहणा-वस्त्र, सब सिंगार चाहियेगा,
एक रत्न जड़ाऊ गल, नौ लखा हार चाहियेगा।।1।।

मेरै धोरै ना दमड़ी-दाम, बण मैं कटैगी उमर तमाम,
तनै आशकी का काम, मेरी नार चाहियेगा,
एक मन-तन की बूझण आला, दिलदार चाहियेगा।।2।।

मनै बुरा समझ चाहे अच्छा सूं , बख्त पै कहण आला सच्चा सूं,
मै तै बच्चा सूं, तनै भरतार चाहिएगा,
ना बूढा ना बालक, जवान एकसार चाहिएगा।।3।।

मेरै धोरे ना दमड़ी-धेला, क्यूं कंगले संग करै सै झमेला,
तनै मानसिंह का चेला, एक होशियार चाहियेगा,
वो लखमीचन्द गुरु का, ताबेदार चाहियेगा।।4।।

लकड़हारे की बात सुनकर अब बीना क्या कहती है-

हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार, मर्द की खास दवाई हो,
मेल मैं टोटा के हो सै ।।टेक।।

टोटे-नफे आंवते-जाते, सदा नहीं एकसार कर्म फल पाते,
उननै ना चाहते सिंगार, जिनकै गात समाई हो,
मर्द का खोटा के हो सै।।1।।

पर्ण पै धड़ चाहिये ना सिर चाहिए, औरत नै घर चाहिये ना जर चाहिए,
बीर नै वर चाहिये होशियार, मेरी नणदी के भाई हो,
अकलबन्द छोटा के हो सै।।2।।

पतिभर्ता नित स्वर्ग झुलादे, दुख-विपता की फांस खुलादे,
भुलादे दरी-दत्ती पिलंग-निवार, तकिये-सौड़ रजाई हो,
किनारी घोटा के हो सै।।3।।

लखमीचन्द कहैंगे मेरे रुख की, सजन वें हों सै लुगाई टुक की,
जो दुख-सुख की दो चार, पति तै ना हंस बतलाई हो,
तै महर-मलौटा के हो सै।।4।।

अब लकड़हारा बीना को क्या समझाता है-

मत साथ चलै, दुख मैं हिरदा जलै,
बण मै कुछ ना मिलै, हैरानी रहेगी,
सुण सिंहणी की बच्ची, तू ना वायदे की कच्ची,
तेरी बात ये सच्ची, जुबानी रहेगी ।।टेक।।

मत दुख दे बसर को, मैं दबाता जिगर को,
चली जा अपने घर को, आसानी रहेगी,
अब तो तू भी सती, और हम भी जती,
कभी किसी की कती, ना निशानी रहेगी।।1।।

नित्य उठके सवेरे, मुख से साजन को टेरे,
शरण में मेरे, तेरी जिन्दगानी रहेगी,
मुझको ये है अन्देशा, बुरा कंगले का पेशा,
तुझे आशा हमेशा, बिगानी रहेगी।।2।।

बन म्य दुखड़ा सहै, किसके आगे कहै,
कंगली रहै, और यह कहानी रहैगी,
रात भर सारी, वन में गुजारी,
ये व्याकुल तुम्हारी, रुहानी रहेगी।।3।।

नीचे तू गिरज्या उछलके, बण में रो-रो बिलके,
एक दिन मिट्टी म्य मिलके, जवानी रहेगी,
वरना लखमीचन्द की तरह, हरगिज तू मत फिरै,
रक्षक दाहिने तेरे, खुद भवानी रहेगी।।4।।

बीना ने कहा मैं कंगलेपन में ही आप के साथ गुजारा कर लूंगी, लकड़हारा कहने लगा मेरे साथ तो केवल दुख ही दुख हैं। लकड़हारा क्या कहता है-

जै किसे राजकंवर कै होती तै, न्यूऐ पांया-पाया फिरती के ।।टेक।।

उतरज्या तेरे चन्द्रमा से चेहरे, तनै दीखैंगे घोर अन्धेरे,
बण मैं बोलै शेर भगेरे, तेरे प्राण लिकड़ज्यां डरती के।।1।।

हम बस होगे कर्म रेख कै, बेमाता के लिखे लेख कै,
बीना गोरी तेरा रूप देख कै, होज्यां खम्भ हालण नै धरती के।।2।।

कदे तेरे बाल सजे थे मोती तैं, कुण ठावै था तनै सोती तै,
जै मां बुआ-बहाण होती तै, वैं तेरा नही आरता करती के।।3।।

लखमीचन्द ना भूलै राही, इब तू कंगले के संग ब्याही,
चाहे कोए लाख करो चतुराई, पर मिटते ना लेख कुदरती के।।4।।

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और क्याहें का नहीं गरूर, रहूं तेरे चरणां की दासी,
चाल दुक रस्ता दीखें जा ।।टेक।।

सजन तू कौण बात तै डरया, मनै इब लिया सै सहारा तेरा,
इसमैं भी के मेरा कसूर, दिये तू मनै हंसकै शाबासी,
यो घर बसता दीखें जा।।1।।

घाटा रहै ना अन्न-धन का, फांसा कटै विपत बन्धन का,
बिड़ा म्य खड़ी चन्दन का भरपूर, लगा दिये चौगरदे फांसी,
पौणियां खश्ता दीखें जा।।2।।

रुप की घी केसी जोत बली, रहूंगी दिन-रात हाजरी मैं खली,
तनै बिन पैसां की मिली मजूर, नौकरी देणी ना खासी,
टहलवा सस्ता दीखें जा।।3।।

लखमीचन्द रट माला हर की, मिली तनै अर्द्ध शरीरी घर की,
बहू मिली इन्द्रानी केसी हूर, डरै मतन्या सत्यानाशी,
टुक(तूं) मनै हंसता दीखें जा।।4।।

अब बीना लकड़हारे से उसके रहने का ठिकाना पूछती है, तो लकड़हारा क्या कहने लगा-

रै! सुण राजा रायसिंह की, हो! सीधी कुटी की राही ।।टेक।।

जो धन माया लिखी भाग म्य, घणी नहीं तो थोड़ी मिलगी,
बनडे के मुंह मीठे खातिर, शक्कर केसी रोड़ी मिलगी,
बना बनी दोनू चाले, सारस केसी जोड़ी मिलगी,
शादी थी जरुर पर, बिना ही बरात चाले,
तीसरा ना गेल्या कोए, दोनू जणे साथ चाले,
आपस के मैं करते, प्रेम भरी बात चाले,
जाण बूझ तेरा बाप डूबग्या, तू कंगले के संग ताही।।1।।

राजा के कुमार बिन, जोग के मिलैं थे तेरे,
रंगीले से महलां मै, दिल फूल ज्यूं खिल खिलै थे तेरे,
मखमली फर्शों पै चलते, पैर भी झिलै थे तेरे,
नाम गाम मात-पिता के, मतलब कोन्यां जाणे मेरे,
वस्त्र हैं मलीन देख, फटे और पुराणे मेरे,
जूता तक भी पास नहीं, पैर हैं उघाणे मेरे,
पड़-पड़ छाले फूट गए, क्यूं के घास बणां की गाही।।2।।

संग की सहेली तेरी, आई कोन्या गैल नहीं,
बिस्तर थे रूई केसे, आड़ै उसे पहल नहीं,
जंगल के मां रहणां होगा, हवेली और महल नहीं,
36 प्रकार के भोजन थे. आड़ै निरे चणया की पोया करिये,
शेर-भगेरे बोलै बण मैं, वृथा जिन्दहगी खोया करिये,
तीसरा ना कोये धौरै, सांस मारकै सोया करिये,
मैं न्यूंक रोऊं तेास बाप डूबग्याय, तू निर्धन के संग ब्यााही ।।3।।

मेरे केसा इस दुनिया मैं भाग किसे का मुआ नहीं,
निर्धन बणा खडा तेरे आगै खेला कदे जुआ नहीं,
माता नहीं पिता मेरै, दादी और बुआ नहीं,
लखमीचन्द रटे जा हर नै, पूरी होज्या खवाश तेरी,
सतगुरू जी की टहल करे बिन, बुद्धि हो ना पास तेरी,
आरता के ना करती, जै घर म्य होती सांस तेरी,
एक-एक दोष लग्या, सबकै ले देख चान्दी कै भी स्या ही।।4।।

लकड़हारे ने बताया कि मेरे पास कोई मकान नहीं है मैं तो इस कुटी के अन्दडर रहता हूँ। दोनों बात करते-करते कुटी के अन्दर पहुंच गये-

सारस केसी जोट, कुटी कै धोरै आई ।।टेक।।

रंग ना कमती पके अंगूर के, हम मारे मर गये घूर के,
चमके लागै गजब नूर के, हूर के पतले पतले होंठ, पान केसी लाली छाई।।1।।

माया वचना की बांधी थी, मिलैगी जो साझे की कांधी थी,
चीन की चांदी थी, बिन खोट, फेर मनै रेत मैं रली पाई।।2।।

आज कुछ आन्नीद हुये काया मैं, चलैंगे कदे छत्र की छाया मैं,
गरीब के पायां के मैं, लोट, हूर नै लाख खुशामंद ठाई।।3।।

लखमीचन्दप नै यो छन्द, धरया, कंगला लड़का मन मैं डरया,
री! क्यूंय ना मार गरया, गला घोट, जिस दिन जणया था जननी माई।।4।।

अब लकड़हारा बीना को क्याक कहता है-

हो बैठज्या कुटी मैं, आड़ै महल नहीं सै,
बांदी करैं थी, वैसी टहल नहीं सै ।।टेक।।

हंसणी कित संगत ली कांगा की, बितैगी लिखी हुई भागां की,
वैं थारे नौ लखे बागां की, आड़ै सैल नहीं है।।1।।

हम तेरे देख रुप नैं डरगे, न्यू मेरे फिकर जिगर नै चरगे ,
थारे बिस्तर थे रूई केसे, वैं पहल नहीं सैं।।2।।

हूर परी का मन मोहवण खातर,ना कोए चीज भलोवण खातर,
सोवण खातर, रूई केसे पहल नहीं सै।।3।।

दुख म्य कटैगी उमर डेली, बहुत दिनां तीजण मैं खेली,
तेरे संग की सहेली, तेरी गैल नहीं सै।।4।।

लखमीचन्द छन्द का धरणा, ठीक चाहिए गालम सा भरणा,
आड़ै घूँघट नहीं करणा, छोरे छैल नहीं सै।।5।।

*गालम = ईंट बनाने का समचा

लकड़हारा कहने लगा कि मैंने शादी कराकर अपने आप दुख को खरीद लिया और साथ में तू मेरे दुख में शामिल हो गई। अब लकड़हारा क्या कहने लगा-

ब्याह तै होया, पर होगी दुखी रै गोरी,
घर छुटग्या इब मिली सै कुटी ।।टेक।।

झगड़ा छिड़ग्या तेरी बरबादी का, मै साझी तेरी देह आधी का,
बीना गोरी तेरै ब्याबह-शादी, का चा तै होया,
क्यूं के मद मै ठुकी रै गोरी, पति बटें थे जब कड़ै जा लुटी।।1।।

सदा रहूं जिन्दगी का साथी मैं, बन्धग्या धर्म रुप गाती मैं,
दुख दर्दां का मेरी छाती मैं, घा तै होया,
पर काया फुकी रै गोरी, मुश्किल जागी झाल उटी।।2।।

मौका सही प्रीत पालण का, मैं बचना तैं ना हालण का,
इब म्हारी वंश बेल चालण का, राह तै होया,
पर नाड़ झुकी रै गोरी, हाथां तै जा सै डोर छुटी।।3।।

यो घर धौरै नहीं गाम कै, रहणा होगा दिल नै थाम कै,
लखमीचन्द कहै म्हारे राम कै, न्याय तै होया,
कदे होंगे सुखी रै गोरी, जै जोड़े के मैं रही तै जुटी।।4।।

अब लकड़हारा क्या कहता है-

दिन तै पहलां उठ कै, इस तला मैं नहाया करता,
बण की लकड़ी तोड़ कै, मैं बेचण जाया करता ।।टेक।।

परी धोरै बैठ नसीब कै, बस रहियो ना अपणी जीभ कै,
मेरे केसे गरीब कै, घर कुछ नहीं पाया करता।।1।।

के बुझै मेरे खोज नै, भूल कै आनन्द सुख मौज नै,
सवा मण पक्के बोझ नै, मर पच कै ठाया करता।।2।।

के बुझै मेरे हाल की, दुखी हो सै गति कंगाल की,
गर्ज नहीं धन माल की, सिर्फ भोजन ल्याकया करता।।3।।

क्यूकर रहूं दुख-दर्द खे कै, तबियत शान्ति जल मैं भे कै,
गुरु मानसिंह की आज्ञा ले कै, छन्द नै गाया करता।।4।।

बीना कहने लगी कि महाराज आपका धन्धा क्या है। आप अपना काम बताओ जिससे तुम्हारा रोटी का गुजारा चलता है। अब बीना लकड़हारे से क्या पूछती है-

तेरा जंगल म्य अस्थान, कमाया के करै सै ।।टेक।।

छूटगे हवा देण के जंगले, सोच पतिभर्ता आले ढंग ले,
पड़ी कंगले जिसी दुकान, उम्हाया के करै सै।।1।।

सतावै मत अवसर के चुके नै, मतन्या छेड़ जख्म दुखे नै,
मेरे किसे भूखे ने जजमान, जिमाया के करै सै।।2।।

मैं तनै बचन कहूं सूं सच्चे, जोट म्हारी हसां केसे बच्चे,
सच्चे भगतां नैं भगवान, सताया के करै से।।3।।

कहै लखमीचन्द कर कार ढेठ की, बगै क्यूं सागर तै जगह लेट की,
मुश्किल बाजै तान, पेट की कामं पराया के करै सै।।4।।

अब लकड़हारा अपना रोजाना का क्या काम बताता है-

बण की लकड़ी तोड़कै, दो बख्त सुबह और श्याम,
बोझा ढोवणा हो सै ।।टेक।।

सुबह उठ कै बण मै डोल्लूं, पूरी बीस धड़ी जा तोलू,
मैं बोलू सू कर जोड़कै, जब ले दे सै मेरा नाम,
मुहं दुबकोवणा हो सै।।1।।

जाणदे के दुख बुझे सै मेरे, तू भी ओटैगी कष्ट भतेरे,
बोलें शेरबघेरे चारों ओड़ कै, ना धौरे घर-गाम,
न्यू डरके सोवणां हो सै।।2।।

होणी नै प्राण नहीं त्यागण दिए, मां नै कदे सूते भी ना जागण दिए,
ता ना लागण दिए इस खौड़ कै, मेरी मां के लाड तमाम,
याद कर रोवणा हो सै।।3।।

लखमीचन्द पकड़ हरी के रुख नै, सब रोवे सैं अप-अपणे सुख नै,
बीना दुख नै यो गात निचोड़ कै, कर दिया घणा मुलायम,
न्यू जंग झोवणां हो हैं।।4।।

बीना ने अपने पति से उसके कारोबार के बारे में सारी जानकारी प्राप्त कर ली। अपने पति को बहुत गरीब जानकर उसने अपना छन कंगन निकाला जो घर से लाई थी। लकड़हारे को दे दिया। लकड़हारे ने कहा कि मैं इसका क्या करूँगा। तब बीना मधुर वचन से अपने पति को क्या समझाती है-

बीना बोली शीश झुकाकै, साजन के मन-तन की पा कै,
चाहे जड़ै बेच लिए जा कै, यो छन-कंगण मेरी ज्यान सै ।।टेक।।

मनै सै करे परण की लाग, सेवा कर कै धोल्यूं दाग,
कित का भाग गया कित आ मिल, म्हारी-तेरी जोट मिली कामल,
हो बीर-मर्द का दुख-सुख शामिल, बाकी मतलबी जहान सै।।1।।

पिया मेरा तेरे मै रुख सै, बांट लियों जो साझे का दुख सै,
जो अपणे मुख से बुरी भांखले, अमृत तज विषधार चाखले,
पति तै लुहकमा चीज राखले, उस औरत की के श्यान सै।।2।।

क्यूं मेरी छाती मै घा खोलै, साजन क्यों ना ऊंच-नीच नै तोलै,
तूं मन्दा बोलै क्यूं डरता-डरता, मनै तेरी बूझे बिन ना सरता,
बालम नै सोचैगी पतिभर्ता, कमती ना भगवान सै।।3।।

कहै लखमीचन्द प्रेम मैं भरकै, मैं तेरी साझण सूं हिर-फिरकै,
इस छन कंगण नै के धरकै चाटूं, पतिभर्ता बण दुख नै बांटू,
ज्यान मांगले जब भी ना नाटूं, इसका तै के अनुमान सै।।4।।

बीना के कहने से लकड़हारा छन-कंगण को लेकर चल देता है और अपने में सोचने लगा कि मैं कैसा पापी हूं, जो गहणां भी छीन कर ले आया। ह्रदय के अन्दर दुखी होता है और क्या सोचता है-

एक बर तै हृदय सा हाल्या, छन-कंगण नै बेचण चाल्या,
हे! मालिक तनै के दुख डाल्या, किसे टोटे मैं ब्या हया ।।टेक।।

रट कै चालया कृष्ण-कन्हैया, ईश्वर सबके नाव खिवैया,
सवा लाख रुपया होणा कट्ठा, बात नहीं कोए हांसी-ठटठा,
माधोपुर में जोहरी हट्टा, बड़ी मुश्किल से पाया।।1।।

दया कुछ मुझ गरीब की लीज्यो, मांगू दाम सोय दे दिज्यो,
छन-कंगण चीजो अणमोली, जौहरी लोग बोलते बोली,
किसे-किसे नै कीमत खोली, थी पूरी धन माया।।2।।

आज भगवान राखदे जात, मेरा दुख पाग्या टोटे में गात,
बात नहीं कोए हांसी-ठटठा, सवा लाख रुपया हौणां कट्ठा,
माधोपुर में एक जौहरी हटटा, बड़ी मुश्किल तै पाया।।3।।

सवा लाख दाम बणैं थे सारे, लाख गहणे पै थपे करारे,
लकड़हारे नैं हरी के नाम लिए, कुछ भोजन कुछ नगद दाम लिए,
लत्ते कपड़े सिमा तमाम लिए, करया मन का चाहया।।4।।

रकम बाकी की जमा कराकै, चार आने का ब्याज ठहराकै,
एक नजर फिराकै टोह लिया नाई, करा हजामत काया सुख पाई,
दर्जी के की दई सिमाई, झट उलटा ध्याया।।5।।

लखमीचन्द राम गुण गाकै, जैसा कुछ सौदा ल्या या था चुकाकै,
ल्याकै माल कुटी मैं धर दिया, धन बीना के सुपुर्द कर दिया,
धन-2 गोरी मेरे दुख में सिर दिया, मेरी आनन्द काया।।6।।

अब छन-कंगण के गहणे धरकर अपने कपड़े सिलवा लिये, हजामत बनवाई और खाने का राशन लेकर कुटिया पर आता हैं। दोनों बहुत खुश होते है। पिछले दुख को भूलकर लकड़हारा बीना से क्या कहता है-

इब दाम हाथ म्य होगे रै! गोरी, बेशक मौज उड़ाया करिए ।।टेक।।

तेरा ठाडी का जबर नसीब, समय किसा बदलन लाग्या ईब,
हम तेरे गरीब साथ में होगे रै! गोरी, मेरा आदर मान बढ़ाया करिये।।1।।

तू मेरी गेल्यां करिए इसी, विष्णु नैं भृगु के संग की थी जिसी,
वे खुशी ऋषि की लात में होगे रै! गोरी, न्यूएं तेरे लागै तै लाड लडाया करिए।।2।।

मैं माणस था जन्म का दुखी, दुख-दर्दां मैं काया फुकी,
हम सुखी एक स्यात मैं होगे रै! गोरी, मेरी इज्जत नै शिखर चढाया करिए।।3।।

गोरी धन तू मेरे मन में बसी, हृदय में ज्योत ज्ञान की चसी,
खुशी एक स्यात में होगे रै! गोरी, मेरी इज्जत नै शिखर चढाया करिए।।4।।

अब लकड़हारे के दिन अच्छे आ जाते हैं। अब अच्छे दिन होते हैं तो सभी काम स्वयं ही सीधे हो जाते हैं। अब बीना लकड़हारे से पूछने लगी कि सेठ जी तुम्हारे को क्या देते हैं? लकड़हारे ने कहा दो रोटी और गुड़ व कभी अचार। लकड़हारे ने बताया कि छः साल हो चुके हैं। अब बीना ने कहा कि तुम सेठ से कहना कि मेरा हिसाब कर दो और मैं भी मर्दाने भेष में तुम्हारे पीछे-पीछे आ रही हूं। अब लकड़हारा लकड़ियों का भरोटा लेकर माधोपुर की तरफ चला और क्या कहने लगा-

तज फूलझड़ी नै राही टोहली, झट माधोपुर नै चाल पड़या ।।टेक।।

आज लग्या ढंग दूसरा हौण, लिखी नै मिटा सकै था कौण,
सौण चिड़ी नै बुकल खोली, जब छोड़ फिकर नै चाल पड़या।।1।।

दहणै मृग सुणावै तर्ज, बामैं विषियर था बिल फर्ज,
अपणी गर्ज पड़ी नै लकड़ी ढोली, याद कर हर नैं चाल पड़या।।2।।

आज कै तै लक्ष्मी मिलगी कै पारस, मैं पहले जिसा नहीं रहूं बेवारिस,
सारस जोट खड़ी नै बाणी बोली, तज कै डर नै चाल पड़या।।3।।

कहै लखमीचन्द रट करकै जगदीश, कौण करै झूठ बकण की रीस,
बतादे जै बीस धड़ी नैं कमती तोली, उसके खोदूं घर नै चाल पड़या।।4।।

अब लकड़हारे ने सेठ लोभीलाल के घर पर जाकर लकड़ी डाल दी, और सेठ से कहने लगा कि लालाजी मेरे को लकड़ी लाते हुए पूरे छ: साल हो गए हैं। आज मेरा हिसाब कर दो और लकड़हारा क्या कहने लगा-

लकड़ी ल्याते रै! लालाजी, दुखिया नैं बीत लिए छ: साल ।।टेक।।

मनै छ: साल बीतगे पक्के, अपणे गिण-गिण ल्यूंगा टके,
धक्के खाते रै! लाला जी, बिगड़या मेरी काया का हाल।।1।।

मै दुबला-पतला तेरै चढ़रया सोजा, तू मेरे दुख-दर्दां का खोजा,
बोझा ठाते रै! लाला जी, गोडे टूटे बिगड़ी चाल।।2।।

धरती मैं बड़ज्यां तै कोन्या रोजन, उपर उडज्यां तैं कईं योजन,
भोजन पाते रै! लाला जी, उठैं थी सौ-सौ मण की झाल।।3।।

लखमीचन्द जांटी से चलकै, गुरु ज्ञान लिया हंस-खिलकै,
हम मिलकै गाते रै! लाला जी, ईश्वर रटले जाणैं किसकी काल।।4।।

सेठ ने कहा कि हमारा तुम्हारा कोई हिसाब नहीं है। तू लकड़ी लाया करता तो मैं तेरे को रोटी दे दिया करता। अब हिसाब किस बात का है और तब लकड़हारे ने क्या कहा-

तनै कदे ना सोची आपतै, ले दो-चार आन्ने लेले,
मेरा खर्च डेढ-पाँ चून का, और कीमत के दो धेले ।।टेक।।

कंगला लड़का नीवै सै रै, जख्म जिगर के सीवै सै रै,
तू मुंह लाकै पीवै सै रै, भरे दूध के बेले।।1।।

तू होया बाणियां जाण नै, ना छोडै बुरी बाण नै,
मनै सूकी रोटी दे खाण नै, तनै छौकै साग करेले।।2।।

मैं वृथा जिन्दगी खोया करता, सांस मारकै रोया करता,
मैं बण की लकड़ी ढोया करता, तू बेचै भर-भर ठेले।।3।।

लखमीचन्द हरी गुण गाणा, दिया हाथ का टुकड़ा खाणा,
एक दिन होगा सब नै जाणा, मानसिंह के चेले।।4।।

लकड़हारे और लोभी लाल की बातचीत चल रही थी कि इतनी देर में बीना व्यापारी बन कर आ जाती हैं। सेठ ने कहा कि मेरे पास चन्दन की लकड़ियों का गोदाम भरा पड़ा है। अब भाव 16 रुपये मण के हिसाब से निश्चित हो गया और 16 रुपये मण के हिसाब से पर्चा बना दिया। वह पर्चा लेकर बीना ने पंचायत इक्टनठी की, तब लकड़हारा समझ गया था और वह क्या सोचने लगा-

मेरे धोरे तै गोरी, घड़ी-स्यात मैं गई,
फैंसला करावण वा, चुकड़ात मै गई ।।टेक।।

कीमत सोला रुपये मन ठहराई, हूर नै चिट्ठी तुरंत लिखाई,
मेरे मर्ज की दवाई, ले के हाथ मै गई।।1।।

यू लालाजी बेचया करता तेल, आज कहै दूर परे सी नै खेल,
तेरे कड़वे बोलां की सेल, गड मेरे गात मै गई।।2।।

मिलरी म्हारी सारस केसी जोड़ी, या बात नहीं सै थोड़ी,
जैसे चालणी सी घोड़ी, चढ बारात में गई।।3।।

दुनियां झूठे जोड़ै गीत, सच्ची किसे-किसे की प्रीत,
लखमीचन्द की नीत, रघुनाथ मै गई।।4।।

बीना ने बाजार के सभी सेठों को इकट्ठा कर लिया और लकड़हारे के बारे में कहने लगी कि इसने छः साल तक 20 धड़ी रोजाना चन्देन की लकड़ी तुम्हा रे घर पर ड़ाली है। मैं आज इसका हिसाब कराने आई हूं। यें मेरे पति हैं और मै राजा रायसिंह की लड़की हूं और कहती है-

मैं राजा राय सिंह की बेटी, बीना नाम सै मेरा,
इसनै तू गैर शख्सट मत जाणैं, यो बालम मेरा सै ।।टेक।।

यू बेटी राजा की ब्यााहवणीयां, कुणसै तू धमकाकै ताहवणिंया,
न्यूंटये सोचै के लकड़ी ल्या वणियां, खास गुलमा सै मेरा,
म्हांरे तू दाम मारणे ठाणैं, जो कुछ लेरया सै।।1।।

हिसाब करदे लकड़ी तोडी का, यो होशियार उमर थोड़ी का,
यो मेरी जोड़ी का बालम, सच्चाो धाम सै मेरा,
इसनै तू कंगला करकै ताणैं, क्यूं धक्केल देरया सै।।2।।

पिता नै मैं इसके संग ब्यााही थी, बात तेरी इसनै बताई थी,
मैं तै इसकी गेल्यांग आई थी, और बता के काम सै मेरा,
इसनै तू भूल्यां नहीं पिछाणै, के तनै बेरा सै।।3।।

लखमीचन्द दुख-दर्द गमन, गेल्यां मैं आई समझ कै सनम,
योहे तै जन्म‍, भोम योहे गाम सै मेरा,
सोची सब सेठ मिलैगें औढाणै, यू न्यूं घर घेरा सै।।4।।

सेठ लोभीलाल बिना की बात सुनकर शर्मा गया और डर गया। उसने लकड़हारे को एक एक पैसे का हिसाब चुका दिया। बीना और लकड़हारा अब खुशी-2 कुटिया में आते हैं तो बीना पिछले वक्ते को याद करके क्याा कहती है-

मा‍त-पिता हों जन्म देण के, ना कर्मां के साथी,
सतगुरू ज्ञान विचार बिना, कोए बणता नही हिमाती ।।टेक।।

जो सतगुरू नै परख दिया, वो खोटा ना रहणे का,
जो मालिक नै बढा दिया, वो छोटा ना रहणे का,
चतुर आदमी कार पशु, कदे मोटा ना रहणे का,
जडै पतिभर्ता धर्म बणया रहै, उडै टोटा ना रहणे का,
जै टोटा भी आज्याम तै, बीर नै चाहिए बज्र केसी छाती।।1।।

सतगुरू जी की आज्ञा बिन, के कला सवाई हो सै,
12 वर्ष तै ऊपर रोगी, आपणी आप दवाई हो सै,
बेटी धी नै लेण देण की, मान बड़ाई हो सै,
बख्त पड़े पै काम लेण नै, या कष्टई कमाई हो सैं,
बिना कमाये ना कुटम्बै कबिला, ना कोए गोती-नाती।।2।।

लोभी लाल का कमा-कमा, घर ठाढा भर राख्याा था,
लाकडियां के बोझ तलै, करडा सिर राख्याक था,
परमेश्वंर नै दिवा दिया, जो कुछ मनै कर राख्याय था,
छन-कंगन भी छुटा लिया, जो गिरवी धर राख्या था,
फेर मर्दाना भेष तारकै, उसनै लाली घूंघट गाती।।3।।

परमेश्वदर नै दिवा दिया धन, जो कुछ खो राख्या3 था,
बालकपण मैं दया लई, क्यूंसके सब दुख रो राख्याय था,
मानसिंह सतगुरू के आगै, न्यूंल जंग झो राख्याा था,
लखमीचन्दस तू काट लिये, तनै जो कुछ बो राख्याा था,
काटण खातिर खेत बता दिया, दे दी ज्ञान दरांती।।4।।

लकड़हारा भगवान की कृपा का शुक्रिया करता है-

हे! प्रभू तेरी कुदरत से, सब बण गये काम,
राम हरे, राम हरे, राम हरे राम ।।टेक।।

याणे से की माता मरी थी, बणखण्डे की विपत भरी थी,
जैसी मजदूरी तेरे नाम पै करी थी, प्रभू वैसे ही मिल गये दाम,
हरे राम, हरे राम, हरे राम।।1।।

हे! प्रभू थारे चरण गहूं, थारी सेवा मैं दिन-रात रहूं,
तनै कृष्णर कहूं की कन्हैकया कहूं, हे! प्रभू थारे एक सहस्त्र नाम,
हरे राम, हरे राम, हरे राम।।2।।

तुम्हामरे गुणां की कब तक करूं बड़ाई, पार तार दी मीरा बाई,
नन्दाा नाई सदन कसाई, प्रभू जी तारे भक्तर तमाम,
हरे राम, हरे राम, हरे राम।।3।।

लखमीचन्द‍ तै साज दे दिया, लकड़हारे तै राज दे दिया,
बीना को सत का ताज दे दिया, हे! सच्चे घनश्याम,
हरे राम, हरे राम, हरे राम।।4।।

अब लकड़हारा और बीना आन्न द से जीवन व्यखतीत करने लगे, अब बीना ने कहा कि सास के फूल उठाकर गंगा जी जायेंगे और वहां दान-पुण्यट भी करेंगे, अब बीना अपने पति से क्या कहती है-

ब्रह्म रूप भगवान जोत से, निकली गंगे माई थी,
मृत्यु लोक मैं इन्सानों की, गति करण नै आई थी ।।टेक।।

एक समय ईश्वर से गंगा जी बोली, कई दफा घबराकै,
मृत्युलोक मैं घणे पापी बन्दे, दोष चढावैं मुझ पै आकै,
ईश्वर बोले गंगा जी से, सबका दुख मेटो जाकै,
तेरा भी दोष उतारैंगे, ऋषि महात्मा न्हा-न्हाकै,
जैसे भागिरथ की करणी से, सब कुटुम्ब नै मुक्ती पाई थी।।1।।

जहां मेरी सास भस्म हुई, पिया वो कौन सी धरणी है,
फूल उठाओ चलो गंगाजी, हृदय यही सुमरणी है,
बिना दान-पुन्य नहीं पार होण के, रास्ते में बैतरणी है,
इस दुनियां की गंगा माता, जन्म पवित्र करणी है,
मेरी सासु तीर्थ के तुल्य, जिन्हें तेरी मूरत जाई थी।।2।।

पैसा-धेला पुन्न-दान खातर, मैल हाथ का फक्त पिया,
नियम धर्म पुन्न-दान की खातिर, हाथ ना चाहिये सख्त पिया,
दया से धर्म, धर्म से राजा, राज से नीति तख्त पिया,
चलो करैं दर्शन श्री गंगा के, निकला जा सै बख्त पिया,
इस ओडै तै दर्शन होज्यां, मैं कदे गगां जी भी ना न्हा ई थी।।3।।

गुरु मानसिंह फन्द कटैंगे, ईश्वर के गुण गाने से,
बड़े-बड़े धन जोड़ जोड़कै, जाते चले जमाने से,
चलो पिया श्री गंगा के, हों दर्शन इसी बहाने से,
तीन जन्म के पाप कटैं, श्री गंगा जी में नहाने से,
ऋषि महात्मां कहैं सदा से, दुख की धर्म दवाई थी।।4।।

अब बीना और लकड़हारा अपनी माता के फूल उठाते हैं और गंगा जी की तरफ चल दिए-

चले न्हाण मर्द और बीर, श्री गंगा जी के धाम नै ।।टेक।।

चाहे भूखा हो चाहे नंगा, चाहे कोए साहुकार नर हो चंगा,
शुद्ध करै गंगा जी का नीर, राजा-रानी रंक गुलाम नै।।1।।

मनै गोरी धन तेरा विश्वास, इसी मुश्किल मिलै करै तलाश,
तनै दिया छोड़ सांसरा-पीहर, मेरा मन मोह लिया गोरी के आराम नै।।2।।

दिन-रात चलते रहे, तन पै भारी कष्ट सहे,
आ गए गंगाजी के तीर, दीखै थी लहर उठती सामनै।।3।।

लखमीचन्द मरणे-जीने मैं, फल मिलता ना खोटे कीने म्य,
बताया नहाणे-पीने म्य क्षीर, यो जल वैदिक वेद तमाम नैं।।4।।

*क्षीर = उत्तम बिना दोष

दोनों चलते गंगा जी के किनारे पर पहुंच जाते हैं तो बीना क्या कहने लगी-

सजन मेरे कर्मां करकै बात, बणन आली थी ।।टेक।।

सुसर जोधा नाथ की बाणी, जिनकी नार सास मेरी स्याणी,
पिया रुपाणी तेरी मात, जणन आली थी।।1।।

ल्या लाड़ लड़ाल्यूं बर नै, सुण शीलक हुई जिगर नै,
सजन तेरे अक्षर नैं बेधात, चुणन आली थी।।2।।

इब दिन आगे सौले, सुण कम अकल-शकल के भोले,
ये तेरे धौले-धौले दांत, गिणन आली थी।।3।।

लखमीचन्द आनन्द का सामा, इब हो लिया गांठ मैं नामा,
आनन्द के कामा की कैनात, तणन आली थी।।4।।

बीना क्या कहती है-

अस्नान करो कुछ ध्यान करो, पुन्न-दान करो,
श्री गंगा जी मै न्हा कै ।।टेक।।

छिद्र मिटज्या पाप दाग का, मिलै कर्मां के लिख्या भाग का,
जैसे माली नै लाए बाग का, रंग हरया मिलै फल धरया मिलै,
पुन्न करया मिलै, परलोक समय जा कै।।1।।

बह सै ठंडे जल की धार, तू मेरी जोड़ी का भरतार,
तेरे पै राजी सै करतार, मैं तेरी नार सति, तू मेरा मर्द जति,
करो मोक्ष गति, जिस जन्म लिया मां कै।।2।।

जैसे ज्ञान मिलै ज्ञाता नै, तेरे पै मेहर करी दाता नै,
सजन मेरे इस गंगे माता नै, कहो सही-सही, मैं बूझ रही,
के चीज दई, जो तनै ठा ली दबका कै।।3।।

लखमीचन्द रट माला हर की, मिली या तनै अर्धशरीरी घर की,
सूं खाली भाइयां के सिर की, ले चलू भरी, खाई कसम खरी,
के चीज तेरी, कित भाजू सूं ठा कै।।4।।

जब लकड़हारा स्नान करने लगा तो उसका यह तबीज गिर गया जो उसकी मां मरते समय उसके हाथ को बांध गई थी। लकड़हारे ने बीना को तबीज के बारे में सारा सब कुछ बता दिया तो बीना बोली महाराज मुझे भी दिखाओ यह कैसा तबीज है। अब लकड़हारा क्या कहने लगा-

ढके-ढकाये ढोल धरे सै, तै धरे रहाणदे नैं,
क्यूं पाछले पाप उघाड़ सै।।टेक।।

बिती लिखी हुई भागां की, हंसणी नै कित संगत ली कागां की,
धर्म के बागां की घमरोल हरे सै, तै हरे रहाणदे नै,
क्यूं फल-पत्ते झाड़ सै।।1।।

मैं आधीन सूं नरम गात का, इसमै पता मेरे पिता-मात का,
इस मैं मेरी जात-पात का तोल मरे सै, तै मरे रहाणदे नैं,
क्यूं मेरी ज़ात बिगाड़ सै।।2।।

नीच पाग्या तै घणी डरैगी, किते कुंए मैं डूब मरैगी,
मेरे हंस-हंस करेंगी मखोल प्रेम मैं भरे सै, तै भरे रहाणदे नै,
मिले हुए क्यूं मन पाड़ै सै।।3।।

कहै लखमीचन्द सहम जी रहा सूं, प्याला मै सतगुण का पी रहा सूं,
परखले हीरा सूं अनमोल खरे सै, खरे रहाणदे नै,
क्यू मनैं बाटां तै हाड़ै सै ।।4।।

अब लकड़हारे ने वह तबीज बीना को सौंप दिया। अब बीना कहने लगी कोई किश्ती लाओ, जब लकड़हारा किश्ती लेने चला गया तो पीछे से अकेली बीना को देखकर, डाकू विजय सिंह और माधोसिंह बीना के पास आ जाते हैं। बीना क्या कहती है-

विजय सिंह बेईमान की, नजर पड़ी तस्वीर,
बीना जोर तै बोली ।।टेक।।

बेला इस पापी नैं ठाई, सिर पै खेल रही करड़ाई,
लई सहम बुराई जहान की, फोड़ लई तकदीर,
इज्जत जाणकै खोली।।1।।

बणां था भामासुर मन मै शेर, कैद मै कन्यां दई थी गेर,
फिरी मेहर कृष्ण भगवान की, जब सन्मुख चाले तीर,
जगह उन्नै मरण की टोहली।।2।।

ठाली वा ज्यादा दुख पावण नै, इसकी के श्रद्धा थी ठावण नै,
जैसे रावण नै हड़कै जानकी, करवा (खपा) लिया कुटम्ब आखीर,
लंका खाक की होली।।3।।

करया लखमीचन्द नै ज्ञान शुरू, ज्ञान तै होगे पार धुरु,
गुरु मानसिंह के ज्ञान की, कुछ न्यारी-ऐ तासीर,
पड़ती साज पै डोली।।4।।

अब डाकू बीना को कहते हैं-

चुपकी रहै मत कड़वी बोलै, विजयसिंह का हृदय छोलै,
धन्य गोरी जब घूंघट खोलै, किसी बिजली सी चमकै ।।टेक।।

कुछ तै सोधी गात मैं राख, तू नहीं बण म्य फिरण के लाख,
तेरी दोनू आंख तेग सी लड़ती, नागन की ज्यूं जुल्फै झगड़ती,
माथे पै त्योड़ी भी ना पड़ती, किसा चन्दा सा दमकै।।1।।

के लेगी बुरे फैल मैं, चल कै देख रंग महल मैं,
तेरी रहैं टहल मै बान्दी दासी, बरतण खातिर माया खासी,
बणखण्ड मैं तू भूखी-प्यासी, मरज्यागी भम कै।।2।।

तेरी बेला बहण ऐश मै भर कै, कदे ना सहम दिखादे मर कै,
नाड़ कतर के ज्यान गवांदे, उसनै तूं नियम और धर्म सिखादे,
बेला नैं कुछ लखण लादे, दस पन्द्रह दिन थम कै।।3।।

गुरु मानसिंह गौड़ ब्राह्मण जात, लखमीचन्द सेवां करैं दिन-रात,
गुरु की बात कदे मत भूलै, इतना क्यों नशे बीच मै टूलै,
सहम फिरै से ठाऊ चूल्है, रहो नैं एक जगह जमकै।।4।।

अब बीना क्या कहती है-

इबकै दुखी करोगे ज्यादा, याडै मैं मरज्यांगी,
जिन्दगी नै त्याग कै ।।टेक।।

तुम बुरे काम छोड़ दो छल के, बणो मत पत्थर केसे दिल के,
मेरे बाबुल के पिता मेरे नाते मैं दादा, अर्ज करूं सूं पायां लाग कै।।1।।

थारा कुकर्म पै एका सै, ध्यान क्यूं बुरी जगह टेका सै,
इब तै पहलम किते देख्या सै कायदा, गई हो ब्याही, हंसणी कोए काग कै।।2।।

क्यू खोटा काम करै, बड़ों का क्यूं नाम बदनाम करै,
मेरा राम करै हो मेरे मन कैसा ईरादा, थारी कुंवारी बेटी जा भाग कै।।3।।

लखमीचन्द का बसणा जांटी, तोड़दे भ्रम जाल की टाटी,
के मिलज्यागा माटी गेरे तै फायदा, बीच रजपूतां की पाग कै।।4।।

विजय सिंह की बात सुनकर बीना आगे क्या जवाब देती है-

चोर-जार लुच्चे डाकू का, के इतबार करूंगी,
बेईमान थारी छाती के मैं, टक्कर मार मरूंगी ।।टेक।।

पर त्रिया पर धन लूटण का, बेईमान करया करो टाला,
ना तै मरती बरियां मिलैं बुराई, हो दरगाह मैं मुंह काला,
मेरी सास नै जण राख्या सै, मेरे सिर पे धणी रूखाला,
जै चाहो सो खैर ज्यान की, लो बांध धर्म का पाला,
तुझ भरे जहर के प्याले की, हरगिज ना घूंट भरूंगी।।1।।

भले पुरुष तै वें हों सैं, जो शर्म-आबरु रखते,
पर त्रिया को मात समझ, पर धन को माटी तकते,
विषय वासना लक्ष्मी को, वें जहर समझ नहीं चखते,
नेम धर्म और ज्ञान धर्म से, ईश्वर के गुण लखते,
इसे-इसे बन्दा के आगे तै, मैं जोड़े हाथ फिरूंगी।।2।।

चोर-जार कै पां ना होते, पल मैं डूबा ढेरी,
हो कै काग हंसणी तकता, के श्रद्धा सै तेरी,
मेरी सास नै जण राख्या सै, थारे नाम का केहरी,
मैं घर बैठी मिल ल्यूंे बेला तै, जै पार बसागी मेरी,
मेरा बालम किश्ती लेण गया, मैं परले पार तरूंगी।।3।।

भले पुरुष का सत्संग तै, किसे भले पुरुष कै लागै,
सतसंग ज्ञान विचार बिना तू, रहा काग का कागै,
यम के दूत पकड़ कै लेज्यां, फेर आगे तै कित भागै,
मैं तेरे सारे खोट बखाणूंगी, धर्मराज के आगै,
लखमीचन्द कहै तेरे नाम की, बणाकै मिसल धरूंगी।।4।।

अब अचानक उसी किनारे पर लकड़हारे के पिता राजा जोधनाथ निकल आए। राजा को देखकर डाकूओं ने बीना को तो छोड़ दिया परन्तु लकड़हारे को अपने कब्जे में करना चाहा। जब लड़के को डाकूओं ने पकड़ा तो वह रोने लगा और क्या कहने लगा-

एक की दारु दो बतलाई, दो की चार दवाई,
दोनू हाथ पकड़ लिए कसकै, कुछ ना पार बसाई ।।टेक।।

नाड़ पकड़कै आगै कर लिया, हिणां माणस करकै,
मत खुरकाओ बालक सूं, मेरी ज्यान लिंकड़ज्या डर कै,
होणी तै जब पैंड़ा छूटै, कती ज्यान ले मरकै,
इस बन्दे का भाग अगाड़ी, पायां पायां सरकै,
लागै सै मेरै मतन्या मारो, हटज्याओ वक्र कसाई।।1।।

मेरे धोरै ना फूटी कौड़ी, तुम लागू लाल रत्न के,
मैं प्रदेशी तुम प्रदेशी, तीनू तीन वतन के,
मैं गड़वाला मेरी गैल और, हम दोनू एक मथन के,
धर्म जाण गंगा मै न्हाए, मन कर बैल जत्न के,
मेरी अधम बिचालै गाड़ी रहैगी, गारयां मै घंसी धसाई।।2।।

जिसा काम मेरा बणग्या इसा, और का बणना ओखा था,
मेरी जिन्दगी सहज बसर होज्या, न्यूं मन मैं धोखा था,
माथा तै मेरा जब ठणक्या, मैं ब्याह खातिर टोका था,
इसा ब्याह करवावण तै, मैं कवारा-ऐ चोखा था,
उड़ै बीना हूर तड़फ कै मरज्या, होज्या लोग हंसाई।।3।।

धिगताणें तै गेल्यां करदी, मैं बहुत घणा नाटया था,
तुम नै ब्याह क्यूं ना करवाया, के माया का घाटा था,
बेअकली म्य रायसिंह नै, गलां बीना का काटया था,
तुमनै बेला हूर उठाली, मनै न्यू बेरा पाटया था,
कहै लखमीचन्द मरो कीड़े पड़कै, तुमनै कवारी बीर नसाई (सताई)।

अब लकड़हारा आगे क्या कहता है-

मत कुमति करो, अधर्म से डरो, लुच्चे डाकू फिरो, इस दुनियां मैं भाई,
ये है सच्चा किनारा, बहे गंगा जी की धारा, नष्ट करै तुम्हारा, श्री गंगे माई ।।टेक।।

ले जाते हो कहां, मैं मरूंगा यहां, तड़फ कै मरज्या वहां, राजा रायसिंह की जाई,
पतले चिकने से धड़ की, शोभा केले केसी घड़की, वो राजा की लड़की, हम गरीबों के ब्याही।।1।।

मुझे तक कर अकेला, क्यूं करते झमेला, इन बातों में ना धेला, क्यों करते हंघाई,
मैं हूं कीमत का मोती, निकालो ना ज्योति, दया जिनकै ना होती, वो दिल के कसाई।।2।।

कहूं दो बात अर्ज की, अपनी गर्ज की, तुम्हारे मर्ज की, ना मुझपै दवाई,
क्यों चढते हो सिर पै, याणी उमर पै, जाकै मालिक के घर पै, दूंगा सौ-सौ दुहाई।।3।।

लखमीचन्द ये क्या किया, दुख मुझको दिया, शरणां उनका लिया, जिन्नै ये बातें बताई,
कहैं हर जपने को, ना चैन सपने को, गुरु अपने को, दूंगा मैं सौ-सौ भलाई।।4।।

अब डाकू लकड़हारे को भी उसी भौरे में ले जाते हैं जहां बेला को रोका हुआ था । डाकू जब उसको भोरे में डालने लगते हैं तो लकड़हरा उनसे क्या अर्ज करता है-

मनै मतन्या खींचो ताड़ो रै! भाईयो, मैं इस फन्दे के मैं फहणे का नहीं ।।टेक।।

खा लिया भिरड़ा केसे छात्यां नै, मैं सब जाणूं सीले-तात्यां नै,
लत्तया नै मत पाड़ो रै! भाईयो, यो तन जाड़ा-गर्मी सहणे का नहीं।।1।।

दुख हुआ न्यारे-न्यारे पाटयां तै, यो तन बिन्धया शूल-काटयां तै,
मनै लाठयां तै मत झाड़ो रै! भाइयो, यो फल खाटे टहणे का नहीं।।2।।

हूर रहैगी कालर कोरे मैं, दुख पड़ग्या बालक छोरे मैं,
मनै भोरे मैं मत बाड़ो रै! भाईयो, मैं इस हाथे मै रहणे का नहीं।।3।।

लखमीचन्द के खोट मेरे मैं, क्यूं करड़ाई घेरे म्य,
मनै अन्धेरे मै मत साड़ो रै! भाइयो, कोये मेरे जिसे फूटे लहणे का।।4।।

*लहणे = भाग

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बात मेरी परचे में लिख ले, गरीब के मारे का दुख हो ।।टेक।।

क्यों जन्मैं थी मां सत्यानाशण, लगे मनै गरीब समझ के ताशण,
बासण जौणसा आवे म्य पकले, फेर चाहे होली की लुक हो।।1।।

क्यों बणरे सो ब्रह्म कसाई, तुमनै दया जरा ना आई,
भाई मनै मार पीटके छिकले, न्यू के इज्जत म्य टुक हो।।2।।

मेरा किसे तै बैर नहीं था गाढा, मेरे डरते का चढग्या जाड़ा,
जै ठाड़ा हीणे नै तकले, फिर हर चाहे सुख हो।।3।।

लखमीचन्द दूसरा दर्जा, गढ़या धर्म का नरजा,
प्रजा पाछे तै कुछ भी बकले, ब्राह्मण तै अग्नि का मुख हो।।4।।

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दया करो गोरी धन म्हारे पै, विपता पड़ी लकड़हारे पै,
गंगा जी के कंठारे पै, तेरी क्यूकर रात कटै ।।टेक।।

पति तेरा भौरे बीच मरै, तू मनैं कड़ै टोहती फिरै,
तेरे कौण करै खाणे-पीणे की, जब तूं क्यों बहू बणैं थी हीणें की,
बीना तेरे मरणे-जीणें की, क्यूकर खबर पटै।।1।।

परी तू ना सुख तै सोवैगी, अपनी जिन्दगी नै खोवैगी,
टोवैगी हींस-बोझड़े झाऊ, दिन मैं मुर्दे दीखैं हाऊ,
चन्द्रमा नै दाब रहया राहू, मेरा क्यूकर भरम मिटै।।2।।

थी सारस कैसी जोड़ी, मेरी दुश्मन नै बेल मरोड़ी,
घोड़ी बिना अस्वार बेहुन्नी, दिन तै रात लागती दुणी,
बिना मर्द के गोरी सुन्नी, हरगिज नहीं डटै।।3।।

गुरु मानसिंह कहै तेज रती, लखमीचन्द कहै भेद कती,
जती-सती का करू जिकर म्य, उल्टा चढग्या सांस शिखर म्य,
बीना गोरी तेरे फिकर म्य, चलूआ लहू घटै।।4।।

*चलुआ = खूब लहू जले

अब जंगल में अकेली बीना श्याम के समय अपने मन में क्या कहती है-

मेरे आये ना भरतार, कित ला दी वार,
गंगा धार पार का, जाणां जी ।।टेक।।

कर्मां रेख अगाड़ी सरकती, बैरण मेरी दाहिनी आंख फरकती,
पड़ी कौन सै कर्म की चूक, गया पिंजर सूक, के बिन भूख,
टूक का खाणां जी।।1।।

के तेरा प्रदेशी का साथ सै, मेरी आखिर नै बीर की जात सै,
थारै सब बातां की मौज, धरया क्यों बोझ, कल के रोज,
खोज ना पाणां जी।।2।।

पता ना कुणसी खूंट डिगरगे, दोनू बख्त मिलण नै घिरगे,
गए छपणे सूरज भगवान, पिया बिन ज्ञान, उम्र नादान,
ज्यान का याणां जी।।3।।

कर लखमीचन्द ज्ञान शुरू, ज्ञान से होगे पार धुरु,
गुरु मानसिंह के पायां लाग, धोए जा दाग, बिना भाग,
राग के गाणा जी।।4।।

अब बीना आगे क्या सोचती है-

करड़ाई नै सजन हमारे, घेर लिए दे कै घेरा,
ये तो मेरै यकीदा है, के मर ना सकै पति मेरा ।।टेक।।

एक ब्राह्मण कै कईं लड़की थी, करया सवाल बतलाओ तुम,
मौज करो घर मैं बैठी, बता किसके भाग का खाओ तुम,
कई बोली खां तेरे भाग का, कमा-कमा धन ल्याओ तुम,
एक बोली खां अपने भाग का, मत ज्यादा कलसाओ तुम,
वो पिता नै हुकम दिया बेटी को, यो लूंज पति होगा तेरा।।1।।

वो पतिभर्ता लुन्ज पति की, करण लगी मन की चाही,
झलसा दिखलाने लुन्जक पति को, बिठा टोकरे मैं ल्याई,
मांडव्य ऋषि चढ़े सूली पै, रगड़ लगी काया दुख पाई,
ऋषि ने श्राप दिया रांड होण का, जब पतिभर्ता घबराई,
पतिभर्ता के सत के कारण, रहया 11 रोज तक अन्धेरा।।2।।

त्रिलोकी मैं जाण पटी, के सूरज नजर नहीं आता,
हाथ जोड़ ब्रह्मा जी बोले, दिन को लिकड़ण दे माता,
जै मैं दिन को लिकड़ण देती, मेरा पति जीवता ना पाता,
ऋषि नै श्राप दिया रांड होंण का, यो वचन नहीं खाली जाता,
श्राप टाल दिया मूर्छा दे दी, स्वर्ण का कर दिया चेहरा।।3।।

लखमीचन्द दमयन्ती के सत से, बणखण्ड में एक नीच मरया,
इन्द्रानी के श्राप से, नहूष स्वर्ग से आण गिरया,
मेरे पति के लहू पसे का, बियाबान मैं द्रव धरया,
मुझ पतिभर्ता नै तेरा सहारा, तुम जाणों देह धर्म तेरा,
तू ही मात-पिता और तू ही राम जी, तू ही हमारा घर-डेरा।।4।।

अब राजा जोधनाथ बीना को जंगल के अन्दर लकड़हारे के बारे में बताते हैं कि उसको डाकूओं ने पकड़ लिया है। अब आगे राजा बीना को क्या समझाते हैं-

गंगा जी के खोले के मै, मुर्दे दिखैं हाऊ,
गैर मिलै कोए जात बिगाडै, या दुनियां लुट्टू-खाऊ ।।टेक।।

तेरे पति का बेरा कोन्यां, वो जिया सै-अक मरया सै,
बेहोशी मै चला गया, वो उल्टा नहीं फिरया सै,
के बेरा हो माणस का, यो रीता सै के भरया सै,
मै जां सूं सम्भाल लिए, तेरा सब सामान धरया सै,
ना तै आड़ै चोर-उच्च,के, फिरै भतेरे जूती-लते ठाऊँ।।1।।

तेरे पति के मरण-जीण का, कुछ ना पाटया बेरा,
मैं प्रदेशी तू प्रदेशण, आडै कौण सनीपी तेरा,
तेरा पति तेरे पास नहीं, तनै दीखै घोर अन्धेरा,
जंगल के मैं भौं कोए लुटै, सुन्नाै तक के डेरा,
पतिभर्ता का धर्म संगाती, और ना कोए चाचा-ताऊ।।2।।

पतिभ्रता औरत की जड़ मै, बता के काम मेरा सै,
मेरे लेखै गऊ गंगा जी, बहू-बेटी धाम मेरा सै,
धर्म समझ कै सेवा करते, रक्षक राम मेरा सै,
सब प्रजा की रक्षा करते, छत्री नाम मेरा,
ना तै पाड़-2 कैं आवैं खाण नै, झुण्ड-बोझड़े झाऊ।।3।।

लखमीचन्द सतगुरु के आगै, क्यूं घणी हंघाई करता,
मात-पिता सुत बुआ-बाहण, बहू भाई–भाई करता,
इस कुणबे के मोह म्य फंसकै, नर घणी कमाई करता,
पर मरती बरियां ऐसे बन्दे की, एक धर्म सहाई करता,
कुछ दिन पाछै चाले जांगे, ये धन के लोग बंटाऊ।।4।।

अब राजा जोधनाथ बीना को क्या कहता है-

हे! श्री ठाकुर की सूं, बेटी बेशक घोड़े पै चढकै चाल ।।टेक।।

मनै तेरे पैड़ पति की टोहणी, तनै क्यूं व्यार्था जिन्दगी खोणी,
न्यूएं हौणी थी सो होली हे बेटी, रोवे मत सांस सबर के घाल।।1।।

जगत में रहणा मेल मिलापै, कोए धरती म्य दाबणा थापै,
उसनै आपै टोहलूं हे! बेटी, लयाऊं धरती मै तै खोज निकाल।।2।।

मेरा काम सै विपत बांटण का, वक्त आरया सै तन्त छाटण का,
मेरा नाटण का मुंह ना सै हे! बेटी,लिख-2 पर्चे दूं दुनियां म्य डाल।।3।।

लखमीचन्द कहै मिलवा दूं तेरा वर,सौंप दूंगा महल-हवेली जर,
मांगै तै सिर भी देदूं हे! बेटी, ना सै ज्यान तलक की टाल।।4।।

राजा जोधनाथ की बात बीना की समझ में आ गई। वह राजा को अपना धर्म पिता मान लेती है और राजा उसको अपनी धर्मपुत्री मानकर घोड़े पर सवार होकर जोधपुर शहर की तरफ चल पडता है-

चली बिचारी, बीना प्यारी, संग छत्रधारी, हो घोडै असवार ।।टेक।।

आगै राजा पाछै बीना, गठड़ी उठा लई,
धर्म की बेटी समझ कै, घोड़े पै बिठा लई,
नहीं की बात, सुसरे की साथ, चली सारी रात,
सो-सो जागै संसार।।1।।

दिन लिकड़या चलते रहे, दुनियां देखण लागी,
जिस रानी का त्याग करया था, वाहे राजा नै पागी,
कल गए थे सैल मै, ले आए गैल मै, इब रंग महल मैं,
किसी होगी जय-जय कार।।2।।

जितणी प्रजा थी राज मै, वा सारी-ऐ बुला लई,
अमीर वजीर नौकर-चाकर, सबकी सलाह लई,
जो ल्यावै लकड़हारे नै, विपत डारे नै, उस प्यारे नै,
इनाम दूं कई हजार।।3।।

जो ल्यावै लकड़हारे नै, वो करै मर्द का काम,
पांच सात दस गाम दूं, बाकी दूं और इनाम,
नित्य पास रहूं, खुद खास रहूं, सदा दास रहूं,
लखमीचन्द ताबेदार।।4।।

अब उधर लकड़हारा भौरे के अन्दर पड़ा हुआ होता है तो उसके साथ क्या बीतती है-

हे! रै भौरे मै पड़कै, छोरा टस-टस रोवै,
रायसिंह की नै याद करै ।।टेक।।

राम मेरा पाप और पुन्य तोल दे, सच्चे दिल तै आण बोल दे,
खोल दे बंदिश भीतर बड़कै, राम मेरा रुप लहकोवै,
जाणूं झटपट आज्यां पास तेरै।।1।।

बण मैं दीखै घोर अन्धेर, कदे करले ना शरीर का ढेर,
कदे कोये शेर लिकड़ज्या जड़कै, हूर जिन्दगी नै खोवै,
कदे गंगा जी मै ना डूब मरै।।2।।

हम डरैं रामजी के डर तै, कद दुख होंगे दूर जिगर तै,
देख्या ना कदे घर तै बाहर लिकड़ कै, आज पड़ी जमी पै सोवै,
कित गठड़ी का माल धरै।।3।।

गुरु मानसिंह करैं आनन्द, काटै फांसी यम के फन्द,
लखमीचन्द कहैं छन्द नै घडकै, आज कित रंग दबकोवै,
हम तुम सौ सौ कोस परै।।4।।

जब उन डाकूओं की औरत उनका खाना लेकर आती हैं और भौरे का दरवाजा बन्द देखकर आवाज लगाती हैं तो लकड़हारा आवाज को सुनकर क्या कहता है-

कौण जनानी सी बोली बोलै, अपणे आपै-ऐ खोल किवाड़ ले ।।टेक।।

हम माणस सै माड़े नसीबां के, चटोर घणे नहीं जीभां के,
क्यूं गरीबां के हृदय नै छोलै, चाहे काट तेग तै नाड़ ले।।1।।

जाणूं कितै जिन्दगी नै खोज्यां, सहम न्यूए ढले स्वर्ग मै ढोज्यां,
थारी आंख्या आगे तै होज्यां, कितै परदे-ओल्हे,
जै या धरती मात बिवाड़ ले।।2।।

किसके आगै करूं जिकर मैं, रहूं सूं न्यूं दिन-रात फिकर मैं,
पापी का पाप शिखर म्य डोलैं, जै कोए हीणें की जड़ पाड़ ले।।3।।

म्हारे सब छूटगे ऐश आनन्द, गले में घल्या विपत का फन्द,
लखमीचन्द छन्द नै तोलै, चाहे कांटे पे घर(धर) हाड़ ले।।4।।

*बिवाड़ = जमीन फटना

---

तड़फ कै मरूंगा इस कारागार म्य, ये मिट्टी में ज्यान हमारी मिलेगी,
अगर लागू भी हो कोए मेरी ज्यान का, ना तो मोल मिलै ना उधारी मिलेगी ।।टेक।।

चाहे जावो साख तो, मेरे सुनो वाक तो, मेरे खाने का भोजन परै राख तो,
फखत दो चीज थी मेरे खान लाक तो, या तो जहर ही मिलें या कटारी मिलेगी।।1।।

थारी एक नै सुणु, रो-रो के शीश धुणु, अपने मरणे की घड़ी आंगलियां पै गिणु,
लकड़हारा तो क्या अगर कोढ़ी बणु, बीना ही राजदुलारी मिलैगी।।2।।

पड़या भंग प्यार म्य, नाव मझधार म्य, सब पन से हुआ हूं अलाचार मैं,
तड़फ के मरूं तेरी कारागार म्य, अगर ना बीना दिलो ज्यान प्यारी मिलेगी।।3।।

हुई भंग मती, नहीं झूठ रती, कहै लखमीचन्द मेरी होगी बुरी गती,
रखेगी जो कायम धर्म सो सती, पति की उमर हजारी मिलैगी।।4।।

कहै लखमीचन्द कैसी गति, ना झूठ रती, मुझ बन्दे की दुनिया म्य पौच रती,
जिस त्रिया के बतन से मर्द जती, सती पत्नी की उमर हजारी मिलेगी !5!

अब लकडहारा बीना के परदे की आड में अपनी कहानी सुनता है-

माता नै बणवास टोह लिया, बेटा जणकै दाग धो लिया,
आठ साल का कंवर हो लिया, जिब मां मरगी कंगाल की ।।टेक।।

ऐसी लागी चोट जिगर म्य, बोझ तलै बाल रहे ना सिर म्य,
माधोपुर मै जाया करता, बेच लाकड़ी आया करता,
जिब कितै दो रोटी खाया करता, ना चाहना थी धनमाल की।।1।।

दुख म्य तख्त धरण के हिलगे, राह चलते के गल मै घलगे,
बण मैं मिलगे दो अपराधी, धिंगताणे तै करदी शादी,
बीना कंगले के संग ब्याहदी, थी 17-18 साल की।।2।।

उड़ै था घोर अन्धेरा बण, कुछ टोटा कुछ बालकपण,
छन कंगण बेचे तै धन होग्या, फेर गंगा नहाणे नै मन होग्या,
न्हाएं-धोयें तै शुद्ध तन होग्या, फेर एक बात बणी नई चाल की।।3।।

लखमीचन्द रहया किश्ती म्य देख, किसी लगी रेख मै मेख,
एक पकड़ लिया एक रही रोवती, आंसू तै मुहं रही धोवती,
चौगरदे नै फिरै टोहवती, वा हूर अवस्था बाल की।।4।।

लखमीचन्द न्यू सोचण लाग्या, पकड़ कालजा बोचण लाग्या,
कंगला लड़का लोचण लाग्या, जाणु मछली सूखे ताल की।।5।।

अब बीना लकड़हारे की बात सुनकर साथ बैठी सखी को क्या कहती है-

हे! मेरे बोल पति का लागै, बहाण मेरा जी कररया बतलावण नै ।।टेक।।

हे! मेरे प्रेम गात मै जागै, मीठा बोल पति का लागै,
जब चल्या जिकर कुटी तै आगै, झट तबियत करी परदा ठावण नै।।1।।

बहाण मेरी लगन लगी सै हर मै, हरदम ध्यान रहै ईश्वर मै ,
हे! मेरे प्रेम जिगर मै जागे बहाण, के लूट धरी थी पिया पावण नै।।2।।

कोए पिछला कर्म आण अड़या माड़ा, आज मेरे जी नै होरया खाड़ा,
हे! कद इश्क दुगाड़ा दागै, मै बैठी सूं नाड़ कटावण नै।।3।।

मेरै गया लाग विपत का तीर, बिन्धया कोमल सकल शरीर,
न्यू कौण मर्द बीर नै त्यागै, जैसे सीता ठाली थी रावण नै।।4।।

दुख नै देख-2 जी डरया, मेरा इस फन्दे म्य जी घिरया,
मेरा मन पक्षी बणकै भागै, लखमीचन्द तै हाथ मिलावण नै।।5।।

जब लड़के ने कहानी सुनाई तो बीना ने अपना वही तबीज निकाला। उसका खोलकर देखा और पढा तो सारा भेद खुल गया। अब बीना समझ गई कि यही मेरा पति है, उस परवाने को दिल से लगाती है और क्या कहती है-

परवाना छाती कै ला लिया, भेद लिख्या अनमोला,
एक पहर की तड़फू थी, जब तै क्यूं ना बोल्या ।।टेक।।

पाप रूप की गारयां के मैं, हरगिज ना गरकू थी,
जुणसा धर्म पतिभर्ता का, उसतै ना सरकूं थी,
साजन तेरे फिकर की मारी, डर-2 कै थरकू थी,
तू मीठी-मीठी बात करै था, मैं थम-2 कै परखूं थी,
कदे पतिभर्ता का धर्म बिगड़ज्या, मनै न्यूं ना घूंघट खोल्या।।1।।

फिकर रात-दिन पिया जी, म्हारे मन म्य करते होंगे,
मनै टोहवण की खातिर, बण मैं खूब विचरते होंगे,
कदे एकली की ज्यान लिकड़ज्या, न्यू भी डरते होंगे,
कौण फ़िक्र करै खाणे-पीणे की, भूखे मरते होंगे
तेरे फिकर मैं मनै गात का, फूक बणा लिया कोला।।2।।

हिया उझलके आवण लाग्या, भर आंख्या मैं पाणी,
जंगल के म्य छोड डिगरग्या, तनै ऊंच-नीच ना जाणी,
मेरे जिगर मैं खटकै थी, तेरी या मीठी-2 बाणी,
पहलम तै ना मालुम पाटी, इब तेरी शक्ल पिछाणी,
फेर साजन के गल हाथ गेर कै, दूर हटा दिया ओल्हा।।3।।

साजन आंसू पूछण लागे, आनन्द हुआ काया म्य,
मै भी पतिभर्ता का धर्म समझकै, लोट गई पांया म्य,
बहुत सी लुगाई धर्म ना जाणैं, फुली रहैं धन माया म्य,
गुरु मानसिंह जो धर्म नै जाणै, सदा रहै छत्र छाया म्य,
लखमीचन्द बड़ी मुश्किल तै मिलता, यो बीर-मर्द का चोला।।4।।

बीना के सराहनीय चरित्र, आत्मशक्ति, पतिव्रत धर्म तथा अपने भाग्य पर भरोसे की विशेष बातें ध्यान में रखते हुए, हरियाणा सरकार ने सातवीं व आठवी कक्षा में इस कथा के अंश पाठयक्रम का भाग सम्मिलित है जो नियिमित रूप से पढ़ाया जाता है।