किस्सा राजा हरिश्चन्द्र

एक समय की बात है कि अवधपुरी में त्रिशंकू के पुत्र राजा हरिश्चन्द्र राज करते थे। उनकी रानी का नाम मदनावत था तथा उनके पुत्र का नाम रोहताश था। राजा बड़े सत्यवादी और धर्मात्मा थे एक दिन स्वर्ग में इन्द्र की सभा में सभी देवता उनके गुणों की प्रशंसा कर रहे थे जिसे सुन कर विश्वामित्र ने कहा कि मैं उनकी परीक्षा लूंगा कि राजा हरिश्चन्द्र कितने बड़े सत्यवादी और दानी हैं। विश्वामित्र ने ब्राहमण का वेश बदलकर छल से राजा हरिश्चन्द्र का राज पाट दान में ले लिया और इसके बाद उससे सौ भार स्वर्ण दान देने का वचन भी ले लिया।

विश्वामित्र राजा, रानी और रोहताश कंवर को नीलाम करके सौ भार स्वर्ण दाम लेने के लिये तीनों को कांशी शहर के बाजार में ले गये तीनों को खरीदनें के लिये वहां तरह-तरह के लोग इकट्ठे हो गये। वहीं पर अपने दल बल के साथ वेश्या भी रानी मदनावत को खरीदने के लिये वहां पहुंच जाती है। 50 भार स्वर्ण में रानी और रोहताश रामलाल ब्राहमण ने खरीद लिए 50 भार स्वर्ण के बदले राजा हरिश्चन्द्र कालिया भंगी के हाथ बिक गये। कालिया भंगी के यहां राजा हरिश्चन्द्र अपना नाम हरिया बता दिया राजा और रानी दोनों अलग-अलग हो जाते हैं यहां से यह किस्सा शुरू होता है और राजा स्वयं क्या कहता है-

मेरा गया राज सिर ताज आज मेरी नौकरी की हस्ती है
हुकम हजुरी करूं जरूरी नहीं जबरदस्ती है।टेक

मैं राजा तैं नौकर होग्या तूं दासी होगी राणी
सदा समय एकसार रहै ना समय आवणी जाणी
कदे अवधपुरी का राजा था आज भरूं नीच घर पाणी
नौकर बण कै खाऊं टुकड़ा करकै कार बिराणी
इज्जत थी कदे लाखां की आज दो धेले मैं सस्ती है।

जिस नै जन्म लिया दुनियां म्हं उसनै मरणा होगा
बुरा भला जिसा कर्म करया सब का दण्ड भरणा होगा
काया की किश्ती दिल का दरिया शील तैं तरणा होगा
भली करैंगे पण्मेश्वर एक उसका ए सरणा होगा
तूं चारूं पल्ले चोकस रख या ठग पांचां की बस्ती है।

होणहार बणी होण की खातर तूं मतना ज्यादा रोवै
म्हारे भागां मैं फूल बिछे मत सूल आप तैं बोवै
कुछ करली कुछ कर ल्यांगे मत करी कराई खोवै
गई रैन ईब हुअया सवेरा आंख खोल कित सोवै
तृष्णा नागण काली है फण मार मार हंसती है।

इस बस्ती म्हं काम क्रोध मद लोभ और मोह का रहणा
मन पापी भी फिरै भरमता पड़ता है दुःख सहणा
प्यार का बिस्तर शील का शस्त्र ज्ञान रूप का गहणा
तूं कर ले इब सैल जगत की रहैं किसे बात का भय ना
कहै मेहरसिंह चल देख वहां जहां अटल ज्योत चस्ती है।

हरिया को वरूणा नदी से पानी कर कर सुअरों को पिलाने का काम सौंपा गया रानी मदनावत रामलाल ब्राहमण के घर काम करती है। राजा को कालिया भंगी के यहां काम करते 27 दिन बीत जाते हैं। 27 दिनों में राजा की हालत बहुत दुर्बल हो जाती है वह इतना कमजोर हो जाता है कि पानी का घड़ा सिर पर उठाने में असमर्थ हो जाता है तो घड़े को भर कर वह किसी से घड़ा उठवाने की इंतजार में खड़ा हो जाता है और क्या कहता है-

कद का देखुं खड़ा घाट पै बाट घड़े नै भरकै
कोए माणस ना दिया दिखाई गया बैठ सबर सा कर कै।टेक

शहर की तरफ लखाकै देख्या एक दीख गई पनिहारी
लाम्बी लाम्बी डंग टेकती सूधी नदी ओड़ आरी
करके ध्यान पछाण लई सै खुद मदनावत नारी
मुंह नै मोड़ लिकड़गी जड़कै के रांड़ खार सी खारी
बोली ना बतलाई जाकै भरण लागगी झारी
कितने दे लिए बोल सुणे ना ईब जा कै बुझुंगा सारी
पहलम आली बात सोच कै गया लाम्बी डंग भरकै।

मदनावत के छोह में आगी बोले तै ना बोली
के कानां तै बहरी होगी नाड़ तलै नै गो ली
मुंह सूख बन्द बोल हुय्आ जब देण लागग्या झोली
देखणा तै दूर रहया तनै आंख तलक ना खो ली
पनिहारां आली राही छोड़ कै दूर परे कै हो ली
बरैण के समझ लिए तनै अपनी शान ल्हको ली
चोर लुटेरा समझ लिया के जो गई दुर परे कै डरकै।

दुःख सुख सारे पड़ै भोगने जो लिख दिये कर्म मै
तूं सै नार पतिव्रता कदे गेरै ना भंग धर्म मै
या दुनियां फिरै लुटेरी रानी कदे रहज्या किसे भ्रम मै
न्यूं तै मैं भी जाण गया तेरै रंज सै गात नर्म मै
मेरा दुर्बल बाणा हो रहा था तूं आई ना पास शर्म मै
बाहर लिकड़ले क्यूं बड़री सै इस पाणी सर्द गर्म मै
दया तेरी मनै न्यूं आवै सै कदे ल्याया था तनै वर कै।

इतने डुंगे जल में बड़ कै तूं हाथ पैर धोरी सै
एक पहर की कोडी होरी के चीज तेरी खोरी सै
कती मरण तै डरती ना तूं डूबण नै होरी सै
इसी के चीज तेरी खुगी जो मुधी पड़ टोह री सै
बात बखा की बुझण आया मेरे फेरां की गौरी सै
घड़ा ठवा दे मेहर सिंह नै क्यूं इतना छोह् री सै
तड़कै हें ढोवण लागूं सूं मेरै बाल रहे ना सिर कै।

जब वह मदनावत को देखता है तो उसे घड़े को उठवाने के लिए कहता है तो रानी यह कहकर इंकार कर देती है कि तू भंगी नौकर है और इस घड़े को हाथ नहीं लगाऊंगी। इस पर वह कहता है-

दिल की प्यारी हे रै रै रै क्यूं ना घड़ा ठुवाया।टेक

झूठी जग की मेर तेरे कोए नहीं बेटा बाप
जैसी करणी वैसी भरणी भोगता है अपने आप
माणस के साथी जग म्हं किए हुए पुण्य पाप
मोक्ष धाम टोहणा चाहिए छोड़ कै दुनियां के धन्धे
आच्छी तरीयां देख लिया झूठे हैं तृष्णा के फंदें
ईश्वर बिना तेरा साथी ओर कोए नहीं बन्दे
जो थी पतिव्रता नारी हे रै रै रै ना रहम पति पै आया।

कितै जाइये कुछ बी करिये कर दी है सब छूट तेरी
जो पंचा म्हं बचन भरे थे सारी लिकड़ी झूठ तेरी
पाणी के घड़े पै बैरण आज देख ली ऊठ तेरी
तेरे दिल का भेद गोरी आज तै ए स्पष्ट हुया
म्हारा तेरा प्रेम गोरी आज तै ए नष्ट हुया
हाथ जोड़ माफी मांगू जो आणें मै जो कष्ट हुया
कहूंगा हकीकत सारी हे रै रै रै ना दिल म्हं शरमाया।

छोड़ दिये दुनियां के धन्धे तज कै नै सब मेरा मेरी
उजड़ ज्यागा चमन एक दिन होज्यागी काया की ढेरी
दर्शन दे दास को मतना लावै पलकी देरी
सत पर ही कुर्बान होण धर्म की लगी है बाजी
पलभर म्हं निहाल करदे जिसपै होज्या ईश्वर राजी
चौड़े के म्हां नाट गई जो थी आधे अंग की सांझी
प्रभु तेरी लीला न्यारी हे रै रै रै कहीं पै धूप कहीं पै छाया।

तुम ही सब के स्वामी अर्ज को मंजूर करो
काम क्रोध मद लोभ मोह को चकना चूर करो
जो हृदय म्हं लगी वेदना उस पीड़ा को दूर करो
मेरी विनती सुण कै प्रभु एक रोज आणा होगा
श्रद्धा रूपी बाल भोग आण कै नै खाणा होगा
मुझ दुखिया का बेड़ा प्रभु पार तो लगाणा होगा
कहै मेहरसिंह तू न्यायकारी हे रै रै रै ना तेरा भेद किसी नैं पाया।

मदनावत के घड़ा उठवाने से इंकार करने पर वह उसके नजदीक आता है जिस नदी के घाट पर वह अपनी झारी भर कर खड़ी थी। जब राजा उसके पास आता है तो रानी क्या कहती है-

छाहली पड़ज्यागी झारी पै तूं पाछैसी नै डटज्या
तूं भंगी कै नौकर सै कदे जल झारी का भटज्या।टेक

मैं ना लाऊं हाथ कती तूं ठा लिए आप घड़े नै
कद की देरी बोल पिया तनै हो लिया पहर खड़े नै
सांझ सवेरे देख्या करती नदी के बीच बड़े नै
एक विधि तनै बतला दुं सिद्ध कर लिए काम अड़े नै
मैं बाहर नदी तै लिकडुंगी तूं दूर घाट तै हटज्या।

तूं भंगी कै नौकर सै मैं ब्राहमण की रुटी हारी
इन बातां नै कोण जाणता, सै खुद इसकी नारी
गैर बखत होग्या पिया मैं बहुत वार की आरी
हो ज्यांगी बदनाम शहर में ईब जां सूं ठा कै झारी
चुगलखोर कोए चुगली कर दे डुंडी शहर में पिटज्या।

सारी सुण ली बात पिया ईब क्यूं टुकड़े तै खोवै
मां बेटा हम करां गुजारा क्यूं म्हारे राह में कांटे बोवै
कह देगा कोए राम लाल तै थारे भंगण रोटी पोवै
घर तै देगा काढ, पिया फेर हमने कड़ै ल्हकोवै
एक विधि तनै बतला दुं तेरा दुःख रोज का मिटज्या।

तूं कर कै बड़ज्या नाड़ तलै नै सिर ऊपर नै करिए
लाम्बे कर लिए हाथ घड़े नै ठा कै सिर पै धरिए
सूधा जाईये लिकड़ घाट तै मत डुबण तै डरिए
आज तै पाच्छै मेहर सिंह तूं ठाडा मतना भरिए
छन्द बणा कै तैयार करया चाहे जीभ जाड़ तै कटज्या।

जब राजा को कालिया के यहां काम करते कुछ समय व्यतीत हो जाता है तो वे कमजोर हो गया था क्योंकि 27 दिन तक उसने भंगी का अन्न पानी समझकर कुछ नहीं खाया था। आखिरकार उसने मजबूर होकर खाना पड़ता है और क्या कहता है-

हे ईश्वर तेरी न्यारी माया, कोन्या भेद किसै नै पाया।
अन्न भंगी का करके खाया, मेरी माफ करो गलती।टेक

मेरी किस्मत मुझ तैं रूठी
बेरा ना कद लगै मर्ज कै बुट्टी
झूठी है सब दुनियादारी, किसका लड़का किसकी नारी,
लागी भूल मनुष्य कै भारी ,या तृष्णा चित नै छलती।

जिसकी बात बिगड़ज्या बणकै
वो तो फेर रोवै सै सिर धुणकै
सुणकै क्रोध बदन मैं जागै, ओहे जाणै जिसकै लागै,
किस्मत की रेख कै आगै, मेरी पेश नहीं चलती।

मेरी फूट गई तकदीर
मेरै लगे विपत के तीर
शूरवीर था अकलबन्द चातर, आज रहग्या मामूली जाथर,
होणी बणै होण की खातर, या टाली ना टलती।

मेहरसिंह आकै मेरी धीर बंधावै
मेरा तो हिया उफण कै आवै
भेद ना पावै ना चलै चतराई, बख्त पड़े के बाहण ना भाई
घड़ा ठुवावण तैं नाटी ब्याही, मेरी न्यूं काया जलती।

जब राजा घड़े को उठा कर चलता है तो रास्ते में ठोकर लगकर घड़ा गिर कर फूट जाता है। इस पर कालिया भंगी क्रोध में हरिया को लात मारता है। राजा अपने मन में क्या सोचता है और क्या कहता है-

कोण किसै का बेटा बेटी कोण किसै की राणी
मतना मारै लात कालिए समय आवणी जाणी।टेक

टोटे खोटे दुख मोटे में कोए बिरला ऐ दिल डाटै सै
बखत पड़े पै आदम देह का के बेरा पाटै सै
आज कोण दुःख नै बांटै सै होरी विपता ठाणी।

बचनां के चक्कर में फंस कै होया कांशी जी मै आणा
टोटे कै म्हां आज कालिए मेरा होग्या दुर्बल बाणा
मेरी गैल करै सै धंगताणा या भूख कालजा खाणी।

28 दिन मनै आऐ नै हो लिए राछ किसै का ठाया ना
तेरी दुकान पर तै काले तोला तलक तुलाया ना
मनै भोजन तक भी खाया ना आज पड़ै नयन तै पाणी।

हर कै आगै नर के करले अपणै हाथ नहीं सै
टोटे कै म्हां माणस की काले रहती जात नहीं सै
मिलकै धोखा दिया मेहर सिंह या होगी दुनियां स्याणी।

उसकी ड्यूटी शमशान घाट पर लगा देता है।

उधर रानी मदनावत अपने बेटे रोहतास को शामलाल की पूजा फूल लाने के लिए बाग में भेजती है। जब रोहतास बाग में जाकर फूल तोड़ने लगता है तो विश्वामित्र ने सर्प का रूप धारण करके रोहतास कवर को डस लिया; लड़का मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ा तो ऋषि उससे पूछने लगा कि तुम्हारा अता पता क्या है। इस पर लड़का क्या कहता है-

हाथ जोड़ कै कहरया सूं मेरी मां ने कर दियो बेरा
पड़या बाग में रोवै से के लाल बिछड़ग्या तेरा।टेक

मेरी माता नै जाकै कह दियो दिल अपणे नै डाट लिए
घर तै आए तीन प्राणी आज दाहूं न्यारे पाट लिए
तेरा बेटा मरग्या तूं रह ऐकली बिषियर नै सुत काट लिए
ईश्वर कै आधीन मामला बोलण तै भी नाट लिए
तेल खत्म होया दीपक बुझग्या हो लिया घोर अन्धेरा।

मेरी काया में जहर भरया सै विषियर लड़ग्या काला
इसी कसूती घड़ी बीतगी खाकै पड़या तवाला
मुंह का थूक सूकता आवै होग्या ब्यौंत कुढ़ाला
बेरा ना किस ढाल टुटग्या तेरे कर्म का ताला
तेरे कर्मा का फूल रह्या था आंधी ने आ घेरा।

कांशी कै म्हां रहा करै वा रामलाल कै दासी
रोटी खाए पाछै कह दियो कदे हो निरणाबासी
मुंह का थूक सूकता आवै लगी कसूती फांशी
कांशी के बागां में खूगी आज तेरी अठमाशी
घर के बारा बाट हो लिए उजड़ होग्या डेरा।

समझदार माणस नै चाहिए अपणा कहण पुगाणा
जिस दुखिया का बेटा मरज्या उस तै के गिरकाणा
बखत पड़े पै काम चला दे हो सै माणस स्याणा
सब कयांहे नै भूंडा लागै लय सुर बिन गाणा
मेहर सिंह क्यूं फिकर करै दो दिन का रैन बसेरा।

विश्वामित्र कांशी शहर की ओर चल पड़ते हैं शहर के बाहर जहां पर मदनावत पानी भर रही थी। जिसे देखकर विश्वामित्र आवाज लगाता है कि किसी का लड़का नोलखे बाग में मरा हुआ पड़ा है और उसके सिर पर काली टोपी है मदनावत उस को यह बात दोबारा बताने के लिए कहती है। विश्वामित्र उस को फिर बता देता है तो रानी बाग में जाकर रोहतास की लाश के पास बैठकर रुदन मचाती है तो बाग का माली उससे रोने का कारण पूछता है-

अरी क्यूं शोर करया म्हारे बाग मै रो रो रूकके दे री।टेक

आड़े पक्षी तक भी मौन होगे बोलैं ना पपीहा मोर
काग कोयल एक जगह कट्ठे होगे डांगर ढोर
हाहाकार कर कै रोई इतणा क्यूं मचाया शोर
बड़े दुखां तै बेटा पाला के रूखां कै लागै लाल
न्यूं तै मैं भी जाणुं सुं री खोटी हो सै मोह की झाल
जेठ केसी धूप पड़ै तूं गर्मी में होज्या काल
के लिख दी मुए भाग मै के नाम पति का तूं ले री।

रूंख था यो छाया खातर टूट्या आंधी रेले मै री
दिन धौली में डाका पड्ग्या लूट लई तूं मेले मै री
बतावै कफन काभी तोड़ा ल्हास लहको ले केले मै री
लाश उपर पड़कै नै क्यूं छाती पीट कै रौवै सै री
जब न्यौली मैं तै नकदी खूज्या फेर पाछै के होवै सैरी
पणमेशर सै देने आला ना दुनिया खेती बोवै सै री
कोए रंज मै कोए राग मै सै सब कर्मां की हथ फेरी।

बागां म्हां तै ल्हाश उठा ले ना तै ईकी रे रे माटी होगी
जब मालम पाटै तेरे धणी नै उसकी तबीयत खाटी होगी
पूत के मरे की सुण कै गात मै उचाटी होगी
आड़ै तै तूं ल्हाश उठा ले सर्प गहण का होरया सै री
मेरा भी जी कायल पावै तेरा तै यो छोरा सै री
जाकै ल्हाश नै फूंक न्यूं नै शमशाणां का गोरा सै री
उड़ै जाकै दे दे आग मै अपने बेटे की या ढेरी।

ईब इस नै के देखै सै री इस की नाड़ी टूट लई
पांचों तत्व न्यारे होगे दसों इन्द्री लूट लई
माटी कै म्हां माटी मिलगी सांस हवा मै छूट लई
मेरे आगै क्यूं रोवै सै आगै जा कै बेटा मांग
लखमीचन्द तै गौड़ बामण करणे वो सिखावै सांग
आज काहल के इसे गवैया कीड़ी की ना टूटै टांग
इन जाटां की पाग मै सै जात मेहर सिंह तेरी।

इस के बाद रानी मदनावत क्या कहती है सुनिए इस रागनी में-

मैं न्यूं रोऊं सूं मनै एकली नै छोड़ डिगरग्या
के बुझैगा माली के मेरा बेटा मरग्या।टेक

जाते का मुंह देख सकी ना मैं भी घर तै लेट चाली
नाग लड़े की सुणी मनै जब पकड़ कालजा पेट चाली
के बाग घणी दूर था पर लाग्या कई मील की लम्बेट चाली
इकलौती कै एक लाल था दे काशी की भेंट चाली
बड़ी मुश्किल तै राही पाई आई करकै ढ़ेठ चाली
फूल रहे ना डाली माली वंश बेल नै मेट चाली
उजड़ होग्या बाग नाग आज काच्ची कली कतरग्या।

मेरे दिल में शोक राम जी ओरां कै खुशहाली करग्या
काशी शहर बसैं सुख तै मनै दुखिया जगत निराली करग्या
मां पहलम बेटे का मरणा हद तै ज्यादा काली करग्या
म्हारे घर मैं घोर अन्धेरा ओरां कै दिवाली करग्या
किस कै सहारै दिन काटुं मनै लाड प्यार बिन ठाली करग्या
मेरा किस तरियां दिल डटै बेटा मां की गोदी खाली करग्या
मेरै लेखै देश और राज आज सब पाणी का भरग्या।

जिस कै लागै वोहें जाणै ना दुसरे नै ख्याल होता
हिम्मत ढेठ देख लेती जै यो तेरा लाल होता
मेरी तरियां हो माली तूं भी रो रो काल होता
बेटे के मरणे की सुणकै रूप तेरा विकराल होता
जब लागै हे बेरा तेरा मेरे केसा हाल होता
बाहर तै कुछ ना दिखै भीतर कालजे मै शाल होता
तूं खड्या बणावै बात गात आज दुखिया का करग्या।

जिस दिन फेटै मेरा पति मनै बेटा खाणी डायण कहैगा
डंकणी सिहारी फुहड़ कलीहारी कसाण कहैगा
चांदड़ी निरभाग पापिण, घर खोआ अन्याण कहैगा
मेरी देही नै फुकण खातिर नकटी जाण जाण कहैगा
खप्पर भरणी बेशर्म कई सौ बात आण कहैगा
मेहर सिंह बरोने का मेरे सारे खोट बखाण कहैगा
याड़ै खाली खोड़ छोड़ जीव परलोक सिधरग्या।

माली रानी को समझता है। माली के समझाने पर रानी का कुछ चित ठिकाने हुआ उसने धीरज धरी और केले के पते तोड़कर अपने बेटे की लाश को उसमें लपेटकर शमशान भूमि की राह ली। रानी ने ईंधन गोसा इकट्ठा करके चिता में अग्नि चेतन कर देती है। उधर हरिश्चन्द्र मुर्दाघाट पर चौकीदारी करता था। कालिया भंगी का असूल था कोई भी मुर्दा जलाए उससे सवा रुपया ले ले। हरिश्चन्द्र नहा धोकर ईश्वर के ध्यान में बैठा ही था कि उसे शमशान भूमि से धुआं सा नजर आया वह तुरन्त वहां पहुंचा है। वहां पहुँच कर वह रानी मदनावत से कर का सवा रूपया मांगता है। रानी मदनावत उसे बताती है की ये तुम्हारा पुत्र है और तुम इसे ही दाग देने के लिए कर मांग रहे हो। राजा हरिश्चन्द्र भी बेबस था अपने मन में सोचता है और क्या कहता है-

धर्म हार माणस की सारै बदनामी हो सै
जो मालिक तै दगा करै वो नमक हरामी हो सै।

कर छोडें ना काला मेरे पै करड़ी दाब दै
गाल बकै और जुते मारै तार मिनट मै आब दे
पाई पाई मांगैगा कहै मरघट का हिसाब दे
आज की वसुली की लिखतमी किताब दे।
झूठ मूठ खाली बातां तै के मुफ्त सलामी हो सै

इस कालिया का कर्जा मनै ले के खा राख्या सै
मरघट का कर ले कै देना मेरे जिम्मे ला राख्या सै
एक पैसा भी बेईमाने का कदे ना राख्या सै
समसाणां का चौकीदारा मनै सिर पै ठा राख्या सै
ड्यूटी का पाबन्द नौकर माणस कामी हो सै।

क्यूं खावण नै होरी सै मेरे रोजी रोजगार नै
दया धर्म और ईज्जत मिलती नहीं उधार नै
तूं के जाणें सै राणी मेरे बणज व्यवहार नै
सौ सौ पड़ते लाणें हो सै माणस कर्जदार नै
हाथ का साचा, बात का साचा वो खरी असामी हो सै।

मदनावत तनै बेरा कोन्या काशी जी का रूल
पीछे मुर्दा फुकण दे पहलम ले महशूल
सवा रुपया कर का तै मनै करणा पड़ै वसूल
बिना कर फूंक ले बेटा तेरै लाग रही सै भूल
जाट मेहर सिंह ठाडे आगै घणी गुलामी हो सै।

राजा कहता है कि जब तक तू सवा रुपया नहीं देती तब तक यहां पर मुर्दा नहीं फूंका जा सकता। एक दिन तूं भी मुझे घड़ा उठवाने से इंकार कर गई थी। आज मेरा भी मौका है इतनी बात सुनकर रानी रुदन मचाने लगती है। और क्या कहती है -

मेरै कोडी पास नहीं , मैं कहां से लाऊं महशूल ।

हो पिया जी आज म्हारे घर कै भिडग्या ताला,
रोहतास गया था फूल तोडन लडग्या विषधर काला,
इब ब्याज रहया ना मूल॥

दिन धोली मै लूट लई डाका पडग्या मेले मै,
कफ़न तलक का तोडा होरया ल्हाश ल्हकोरी केले मै,
के तेरै पडरी आंख्यां मै धूल॥

दया तलक तनै आई कोन्या लात कंवर कै मारी हो,
हाथ जोड कै अर्ज करूं सुण पिया छत्रधारी हो,
के ग्या खुद के बेटे नै भूल ।।

जाट मेहर सिंह तेरे आगै हिडक्की दे दे रोऊं सूं,
इब तलक मेरै लगै झलोखा अपने बेटे नै टोहूं सूं,
तू क्यूं ग्या नशे मै टूल ॥

राजा क्या कहता है –

क्यूं रोवै मदनावत रानी मेरे बस की बात नहीं सै
लिखे कर्म मेटन की तै उस कै भी हाथ नहीं सै।टेक

मैं नोकर सूं काले का ना एक मिनट की छुट्टी
जुल्म करे साधू नै मेरी धन माया लुटी
बेमाता भी चाले करगी ना कलम डाण की टुटी
जहर फैलग्या नस नस में कोए दवा लगै ना बुटी
मैं तै भंगी कै घर नीर भरुं मनै सुख दिन रात नहीं सै

जब बाप की जड़ तै पूत बिछड़ज्या जब क्यूकर के हो रै
पूत मरया और कफन मिल्या ना रही केले में लास ल्हको रै
क्यूं जड़ मै बैठ कै रोवण लागी इस कांशी कै गोरै
क्रिया कर्म करै नै बेटे का जै हो सवा रुपया धौरै
ना तै मैं भी मरज्या खुदकशी करकै के आत्म घात नहीं सै

माली के नै फिकर घणा हो फल और फुल लता का
दोहरा डंड भरणा होगा पीछली करी खता का
इस बालक नै के सुख देख्या अपने मात पिता का
जै कर मरघट का ले री हो तै करले ढंग चिता का
हुई बोल बन्द क्यूं चुपकी होगी तू के इसकी मात नहीं सै

अवधपुरी का राज छुटग्या छुटगें ठाठ अमीरी
तेरे पति की काले आगै ना कोए चलती पीरी
मैं नौकर सूं काल का तू सुण ले अर्ध शरीरी
बिना महसूल फूंकै नहीं मुर्दा कहदी बात अखीरी
कह मेहर सिंह बिगड़ी मैं कोए देता साथ नहीं सै।

राजा आगे कहता है

मत रोवै नार रै मेरे बस का काम नहीं सै।टेक

न्यूं तै मैं भी जाण गया न्यूं तै कोन्या बात बणैं
लाश नै ले उठा घाट तै कद का कह रहा सूं तनै
बिना महशुल फुंकै नहीं मुर्दा सवा रुपया दे मनै
चाली जा बदकार रै जै गठड़ी में दाम नहीं सै।

या तूं मन में सोच लिए तनै पहलम बात नहीं जाणी
वो भी समय मेरे याद सै जब भंगी कै भरुं था पाणी
तनै नहीं घड़े कै हाथ लवाया तूं बण बैठी थी मिशराणी
ठा ले जा बेगार रै यो किसे दीन का चाम नहीं सै।

बोलां का तै घा भरता ना घा भरज्या सै फालै का
तूं आडे हे चाली जा यो बखत नहीं सै टालै का
सवा रुपया कर का लूं सूं बुढ़ढे और बाले का
बिना महसूल मुर्दा आड़ै फूंकण देण का काम नहीं सै।

बोल माणस के दुख्या करैं और के दुखै सै लाठी
वो भी समय मेरै याद सै जब घड़ा ठवावण तै नाटी
अपणा सारा दुःख रो लूंगा बरोने तै जा कै जाटी
कहै मेहर सिंह मेरे यार रै के मेरे गुरु का गाम नहीं सै

रानी के पास तो एक पाई भी नहीं थी वह सवा रुपया कहां से देती। उस के पास तो कफन के लिए भी लता नहीं था। रानी कहती है कि ये तेरा भी बेटा है क्या इस का दाह संस्कार नहीं हो सकता। रानी बेबस लाचार थी। सवा रुपया कर के बदले अपना चीर दे देती है। इस बात पर राजा हरिश्चन्द्र के दिल को भारी ठेस लगती है और वह कालिए को जा कर क्या कहता है-

कांशी जी का रूल तेरे मरघट का मशूल
कर ले नै कबूल काले मनै ल्या के दिया रै।टेक

सुणैं तो सुणाऊं काले उस दुखिया का हाल,
चीर तो मैं ले आया कर दिये जुल्म कमाल,
शमसाणां म्हं रोवै थी कहै हाय मेरा लाल
डाटे तैं बी डटी कोन्या उसका बेटा मरग्या काल,
बेवारिस थी खास, ल्याई शमशाणां म्हं ल्हास
पिसा था नहीं पास, मनैं चीर ले लिया रै।

के बुझैगा हाल काले जाता ना कहया
दुखयारी नै दुख और भी होग्या नया
बेवारस की ईश्वर नै भी आई ना दया
एक ही था बेटा उसका वो भी ना रह्या
उसकी खोट ना खता, कुछ मनै दी सता
बुझा दी बेटे की चिता करकै बज्र का हिया रै।

दुखयारी के दुःख नैं देख कै सोच करूं था
कर भी कोन्या छोड़्या तेरे तै डरूं था
मरणे के नां का काले त्यार फिरूं था
उस लड़के की चिता म्हं जलकै आप मरूं था
लिया हाथ पकड़ कै डाट मेरा आगा गई काट
उसकी माता गई नाट ना तो खोद्यूं हे जिया रै।

गुरू लखमी चन्द की मेर मेहरसिंह ज्ञान घुंटग्या
जिसकी छां मैं बैठया करता वो रूख टूटग्या
नाम था हरिश्चन्द्र आज भ्रम फूटग्या
एकलौती कै एक लाल था उसने नाग चूटग्या
इब आ लिया बख्त आखिर उसका तार लाया चीर
वा सै मुझ दुखिया की बीर मैं सूं उसका पिया रै।

हरिश्चन्द्र को बात सुनकर कालिया कहने लगा कि मेरी कांशी में ऐसा दुखिया और गरीब कौन है जिस के पास मरघट का महशूल देने के लिए सवा रुपया भी नहीं है। राजा के दिल में इतनी गलानी पैदा हो जाती है कि उस का जिन्दगी से भी मन उचाट हो जाता है और कालिया को क्या कहता है सुनिए-

गहरी चोट लाग गी काले बस जीवण तै सरग्या
करले खरा महशूल तेरे मरघट का टोटा भरग्या।टेक

बेवारस समशाणा म्हं ठा बेटे नें ल्याई
ईंधन गोसा कट्ठा करकै उपर लाश जंचाई
लाकै आग बैठगी जड़ म्हं धूमां दिया दिखाई
मरघट का कर मांगण लाग्या जब दमड़ी तक ना पाई
न्यूं कह रही थी बेवारिस की क्यूं रे रे माटी करग्या।

बेवारस की चिता बुझा दी दर्द बहोत सा आया
धन माया तैं भरैं थे खजाने आज आने तक ना पाया
कांशी शहर म्हं ल्याकै काले यो किसा खेल दिखाया
कें माणस की पास बसायै या तो सब ईश्वर की माया
मनैं सवा के बदलै चीर ले लिया यो मेरा कालजा चरग्या।

कांशी कै म्हां आकै काले लिया तेरा सरणा था
कर तो मनै न्यू ना छोड़या कै इज्जत का डरणा था
बेवारस बेटे की चिता मै खुद जल कै मरणा था
जिनके बेटे जवान मरै उन्हें जी कै के करणा था
आज सूर्यवंशी खानदान की एक विषयर बेल कतरग्या।

साची साची कह रहयां सू बात करूं गड़बड़ तै
मोती टूट रल्या रेत म्हं दूर हुय सै लड़ तै
जिसकी छां म्हं बेठया करती वो पेड़ काट लिया जड़ तै
ले हाजिर गात करूं काले सिर दूर बगा दे धड़ तै
पणमेसर की मेहर फिरी जब मेहर सिंह छंद धरग्या।