किस्सों की फुटकर रागनियाँ

किस्सा-राजा नल

बणां मै चाल पड़े थे, दुखिया राजा नल रै।।

सदाव्रत चलाणे आले आज खुद भूखे मर रहे
राजा रानी दोनों गाम के गोरे कै फिर रहे
दोनों बालक म्हारे तै न्यारे रानी दुख भर रहे
हम एक-एक वस्त्र मै गात ढक गुजारा कर रहे
आग्गै बेरा ना के होगा न्यू कह कै वे डर रहे
जो दुख में धीर धरगे पार सदा वे नर रहे
खाणे की तो बात दूर रानी को देता कोन्या जल रै।।

किसे नै ना धौरै बिठाये सबका भरोसा उठ गया
राजपाट गया म्हारा घर गाम भी छूट गया
लाग्गै म्हारा भगवान भी म्हारे तै करड़ा रूठ गया
दुख के बोल चभोकै पुष्कर जिगर म्हारे नै चूंट गया
आज कंगले बणने कारण प्यार प्यारां का टूट गया
इतनी कह कै राजा नल सबर की घूंट घूंट गया
जंगल मै इब रहणा होगा करैं गुजारा चल रै।।

बण में फिरते फिरते रानी गोड्डे म्हारे टूट लिए
मेरे साथ आज भाग तेरे भी किसे फूट लिए
इस कलजुग बैरी ने देख दिन धौली मै लूट लिए
बुरे बख्त मै मित्र प्यारे आप्पै सारे छूट लिए
हरगिज तनै त्यागूं कोन्या बात मान मत झूठ लिए
होणी बरैण नै जाणैं हम बणाकै घूंट घूंट लिए
जीवण तक के लाले पड़गे गई म्हारै फांसी घल रै।।

भूख के मारे तड़प रहे दोनों का होया बुरा दीन
कलजुग कद का बैरी था जो राज लिया म्हारा छीन
दो पक्षी देख राजा का ध्यान होया माँस मै लीन
कलजुग पक्षी बण वस्त्र लेग्या कोन्या देख्या गया सीन
राजा रानी दोनों तड़फै जैसे जल बिन तड़फै मीन
मेरे राम इब तै ठाले बेसहारा हम कर्महीन
बच्च्यां का वे ख्याल कर कहवै दो मोती गये रल रै।।

एक कुटी पै दोनों ठहरे जब होगी थी रात
रानी ज्यब्बै पड़कै सोगी दुख पा रहया था कोमल गात
चांद सा मुख दमयंती का रोशनी को दे रहया मात
साड़ी काटण की मन मै नल नै सोच लई बात
एक बै तै मायूस होग्या आज छुटैगा म्हारा साथ
पत्थर दिल कर साड़ी काट्टी कांप रहे थे नल के हाथ
आज का तै दिन कट गया पता ना के हो कल रै।।

जब मै ना दीखूंगा तड़कै जी भरकै नै रोवैगी,
डकरावैगी भटकैगी सारै कित बियाबान मै टोहवगी,
काहल किस तरियां एकली जंगल के म्हा सोवैगी,
निर्जन बण मै ना कोये साथी रेह रेह माट्टी होवैगी,
जै उसनै मैं नहीं मिल्या तै के बेरा ज़िंदगी खोवैगी,
के तै फांसी खा लेगी ना बोझ बराणे ढोवैगी,
या शेर भगेरयां के डर तैं इसके जावैं प्राण निकल रै।।

मुझे पति बणावण खात्यर सत संकल्प कीया था,
स्वयंवर मै जब माला डाल्ली बण्या उसका पीया था,
इसकी रक्षा और पालन का मनै भी व्रत लिया था,
मेरे बिना दमयंती का पल भर ना लाग्गै जीया था,
ब्याह कै जब वापिस आया कलजुग नै शराप दीया था,
शराप साच्चा मानकै राणी का कांप्या हीया था,
कदे सौ सौ मटके न्हाण खात्यर, आज सूक्या जल बिन गल रै।।

जुआ खेलण लाग्या जब भी रो रो कै मनै नाटै थी,
एक मिनट भी प्राणपति तै ना न्यारी पाटै थी,
कदे ना दुख का रोणा रोया हँस कै दुख नै काटै थी,
जंगल मै आये पाच्छै मेरा समझाकै दिल डाटै थी,
दुख सुख को एकसार समझकै जीवन का सांटा साटै थी,
सौ सौ लाड़ लडावै थी ना अलग मेरे तै हाटै थी,
हे ईश्वर या कैसी माया मुश्किल हो री पल पल रै।।

वेद शास्त्र की बात सुणो सुण कै ल्यो चित मै धार,
जुआ हरगिज मत खेलियो खेलण कर दियो टार,
जुए मै जर घर लुटज्या बुरी दुर्गति करती हार,
आज राजा नल को देखल्यो रो रहया सर को मार,
समझ ना आती क्यूकर तारूं सर पै धरया पाप भार,
बालकां का दुख भूल्या ना था इब छोड़ दी ब्याही नार,
और किसे का दोस नहीं अपणी करणी का फल रै।।

ओम नाम मत भूल जाणा इस दुनिया मै आकै,
तन मन शुद्ध हो जाता सात्त्विक भोजन खाकै,
अंतर्मन का मैल उतर ज्या ज्ञान गंग मै नाह् कै,
पुन धरम करणा चाहिये मनुष का चोला पाकै,
दूध नीर सब छण ज्यावै घर पणमेसर जाकै,
जाट मेहर सिंह गाम बरोणा समझा रहया सै गाकै,
बचपन के म्हा लाग गया था मेरै गावण का अल रै।।

किस्सा-गजनादे

रागनी-1
चूडी बेचन चाल पडया मनै कार लई मनियारां की
छजे उपर खडी गजनादे वा लेरी ओट चूबारां की। टेक

गलियारयां मै मैं रूके मारूं यो मोटा मेरा व्यापार नही
चाहे ब्याही पहरो चाहे कवारी किसे तैं ईनकार नही
मैं सस्ते दामां चूडी बेचुं ये ज्यादा किमतदार नही
नार सुहागन चूडी पहरो पर विधवा का सिगांर नही
रूके मांरू माल बेचता ओर करता सैर बजारां की।

जोबन चोखा रंग फिका चूडी बेचन आला मै
रंग बिरंगी चूडी बेचूं ईन गजनपुरी की गाला मै
बेलन सि बांह ठाडी भरदुं सिख लिया डाला मै
कंचन कांच गलोरी चूडी ये पो राखी सैं माला मै
चौबंदा ओर पात सुनहरी करी रोक पिटारां की।

राजकुमार तैं मै बना लखेरा चूडी का रोजगार लिया
बारहा साल तैं फिरूं भटकता अपना बक्त बिचार लिया
गया महल कै नीचै छोरा हंस कै रूका मार दिया
उस गजनादे का रूप देख कै तलै टोकरा तार लिया
झांकी के म्हा खडी देखली झलक पडी सलवारां की।

मेहर सिहँ शरन सतगुरू की मै रंगरया ज्ञान बतादूं
जो सतगुरू पै ज्ञान लिया न्यारा न्यारा सुनादूं
जितने रंग कि चूडी बेचूं मै सारे रंग गिनवादूं
जिसकै चूडी दूं घाल हाथां मै उसनै ब्याली बहु बनादूं
नए नमुने कि चूडी बेचूं ये शिशे ओर चमकारां की।

रागनी-2
बणी बणी का सब कोए साथी ना बिगड़ी का यार होसै
मरते गेल्यां कौण मरै से यो जिंवते जी का प्यार हो सै।टेक

एक राजा कै चार पूत थे मैं था सबतैं छोटा
पिता बोल्या खाओ किसकै कर्म का अन्न प्राणी लोटा
मैं बोल्या खां आपणे कर्म का नफा रहो चाहे टोटा
इतणी सुण कै मेरे पिता नै लिख्या बारा साल दसोटा
वो तो सारा कुणबा नजर बदलग्या मतलब का संसार हो सै।

फेर पांच सात दिन मंजिल काट कै मैं गजपुर कै म्हं आग्या
बियाबान मैं फिरूं भरमता बच्चा था घबराग्या
एक बुढ़ा सा मणयार आणकै मनैं पुचकारण लाग्या
बेटा करकै घरां ले आया उस बुढ़ीया कै मन भाग्या
ईब थारे शहर म्हं करण लागग्या जो मणियारे की कार होसै।

चूड़ी बेचण चाल पड़्या चाल पड़्या मैं सर पै गाठड़ी ठाकै
थोड़ी सी दूर मणियार छोड़ग्या आच्छी तरहां समझाकै
राजमहल की ऊंची पैड़ी रूक्का मार्या जाकै
उस गजना नै बांदी भेज दी लेगी मनैं बुलाकै
रूप देख कै पागल होग्या प्रेम घणां लाचार हो सै।

दुःख सुख तै रहण लागगे ना आपण भेद छिपाया
हंस मुखी नै जा चुगली खाई अपणा पिता सीखाया
यूं बोली तेरी गजना दे नै मणियारा पति बणाया
मैं भेज संतरी कैदी कर लिया राजा नै पास बुलाया
फांसी का मेरा हुक्म दिया जित लग्या हुअया दरबार हो सै।

हाथ हथकड़ी पायां म्हं बेड़ी तौंक गले म्हं जड़कै
उस राजमहल के आगे कै लेज्यां थे जल्लाद पकड़ कै
झांकी के म्हं गजना बेठी न्यूं बोली बाहर लकड़ कै
फांसी के तख्ते पै खड़ी मोहताज मिलूंगी तड़कै
कहै मेहर सिंह मरती बरियां बी ना आई के इन बीरां का एतबार हो सै।

किस्सा-सेठ ताराचंद

रागनी-1
म्हारे भाग कै लागग्या अड़का, करकै दूर जिगर का धड़का,
हापुड़ मै गिरवी धर आओ लड़का, नां ईश्वर का ले कै।।

कोए माड़ा करम अगाड़ी अड़ग्या,
म्हारा साहूकारी का नक्शा झड़ग्या,
दुख पडग्या जो पड़गा भरणा, कष्टां तै ना चाहिये डरणा,
इब रोटी टुकड़े का राह करणा, कद लग रहैंगे दुख खे कै।।

बेटे तै बिछड़ैंगे माँ बाप,
हर नै दुख की मारी थाप,
घणे पाप उघड़ैं पापी पेट तै, बात करिये पिया घणे ढेठ तै,
दो सौ रूपये ले लिये सेठ तै, बेटा गहणै दे कै।।

हमनै कदे के किसे की ओटी,
होणी नै किसी घेंटी घोटी,
खोटी नजर तै कदे मत ताखिये, यार तै या बात भाखिये,
मन्शा मेरे बेटे नै राखिये, अण्डे की ज्यूं से कै।।

हम के थे कदे किसे तै घाट,
म्हारे सब छुटगे रंग ठाट,
जाट मेहर सिंह अगत दीख ली, गाण की सहज पकड़ लीख ली,
चाह मै भरकै रागणी सीख ली, चित भगती रस मै भे कै।।

रागनी-2
तेरे बिना सगाई बान बैठ्ठे, किसा ब्याह होग्या म्हारा।
तम किस रंग ढ़ंग तै रहते सहते, के कुणबा सै थारा।।

दीखो ब्होत बड़े साहूकार के बेटे, आड़ै व्यापार करण आते,
जवान उम्र मै बणज सीख ली, जहाज भी आप चलाते,
वै बंदे आग्गै बढ ज्यावैं, जो मेहनत का टुकडा खाते,
शुभ करमां तै नेक कमाई कर, गुण ईश्वर का गाते,
उनके मनोरथ सिद्ध हो जाते, जिन्हैंनै सही समय बिचारा।।

कौण शहर के रहणे आले, जहाँ चलने की सुरती लाई,
अपणे पिता का नाम बताओ, कौण थारी जननी माई,
आप इकलौती संतान हो या हैं और बहाण और भाई,
नाह धो संध्या कर भोजन पा ल्यो, रोटी भी ना खाई,
अपणी मंजिल उननै पाई, जो हर का लेते सहारा।।

उन कुणब्यां के ठीक गुजारे, जो एक सलाह के होते,
जो कुल की रस्म रीत ठुकरावैं, वैं दुखां मैं खावैं गोते,
गृहस्थ आश्रम का मर्याद मार्ग, जो ध्यान लगाकै टोहतै,
वे भव सागर तै पार उतर ज्यां, ना दुख का बोझा ढोते,
मूर्ख गृहस्थी फिरैं सै रोते, उन्हैनै रस्ता ना पारया ।।

मनुष जूनी मै आकै नै, श्रेष्ठ करम करणा चाहिये,
काम क्रोध मद को तजकै, अधरम तै डरणा चाहिये,
लोभ मोह अहंकार से बचकै, कुन्या तै टरणा चाहिये,
मनु महाराज की बात मानकर, भव सागर तरणा चाहिये,
मेहर सिंह माल्यक का शरणा चाहिये, मिलै मनुष जन्म दोबारा।।

रागनी-3
के बूझैगी धर्ममालकी, मैं दुखी दुनिया तै न्यारा।
मन्शा सेठ का नौकर बणकै, करया करूं गुजारा।।

जगत सेठ पिता थे दिल्ली मै, कदे ताराचंद नाम्मी,
नौकर चाकर टहल करणिया, घणे करैं थे गुलामी,
दानवीर पिता नै हाथ मै, थी धरम पताका थाम्मी,
चाचा हरिराम नै पिता बहकाया, गिरवा दी धरम मै खाम्मी,
पांत तोड़निया ना आये स्याहमी, वे करगे दूर किनारा।।

पतिभरता दयावती माँ नै, जनम्या मैं बेट्टा,
और नहीं को बहाण भाई, माँ का सुत जेट्ठा,
छह साल की उम्र थी मेरी, करमां का हेट्ठा,
खाणे तक के लाले पड़गे, दुख्खां नै दिया लपेटा,
दो सौ रुपये मै गहण धरया बेट्टा, हापुड़ मै मन्शा प्यारा।।

मन्शा सेठ का नौकर बणकै, उसकै रहण लागग्या,
सेठ नै पिता सेठाणी नै माता, मैं कहण लागग्या,
दो भाई दो भावज घर मै, उनकी सहण लागग्या,
आड़ै मौज बेशक, म्हारे घरां टोटे का गहण लागग्या,
एक आधै बै फहण लागग्या, जब वे करदें थे कसारा।।

गैर के घर तनै क्यूकर राखूंगा, या सोच खड़ी आग्गै सै,
समझा लिया मनै मन भतेरा, पर चिंता ना भाग्गै सै,
समझदार नर ना कदे अपणी, ब्याही बीर त्याग्गै सै,
पणमेसर के हुक्म बिना ना, सूता भाग जाग्गै सै,
मेहर सिंह हर के गुण राग्गै सै, सै वो हे सच्चा सहारा।।

रागनी-4
सुती छोड़ दई सेठाणी बिस्तर पर तै हुया खड़्या।
हे भगवान भरोसै तेरै छोड़ बहू नैं चाल पड़्या।।

चन्द्रगुप्त पूत जण कै मां बणी चोरटी हत्यारी
मां बापां तैं हुया अल्हैदा हे मालिक तेरी गत न्यारी
हापुड़ के म्हां करणी पड़री मंशा की ताबेदारी
ओर किसे का दोष नहीं मेरे रूस गये खुद गिरधारी
क्युकर ठाऊं उठता कोन्या यो हरिचन्द आला जबर घड़ा।।

क्युकर छोडूं ना छोड़ी जाती सब तरियां लाचार बण्या
ओढ़ पहर सिंगर रही गौरी इस गौरी का भरतार बण्या
न्हाणा धोणा सब छूटग्या इसा बख्त बेकार बण्या
उस ईश्वर की मेहर फिरी जब मेरा-तेरा प्यार बण्या
दोनूं आंख बांध ब्याही की राही म्हं दिया गाड़ छड़ा।।

जितनी जीन्स तेरे बाप की तार जहाज तैं तलै धरी
बेरा ना कुण खसम बणैगा धन की नई सन्दूक भरी
ओढ़ पहर सिंगर रही गौरी सिर पै चमकै चीर जरी
मैं मुलजिम सूं धर्मराज कै माफी दे दिये मनैं परी
मुझ तोते की गलती म्हं यो काबुल का अंगूर सड़्या।।

सुती उठ सजन टोहवैगी रोवैगी अखियां खोल परी
टापू मै ना जहाज दिखै कूण पटावै तोल परी
केसरी कैसी ढेरी मेरी लुटज्यागी बेमोल परी
मेहर सिंह कै आगै प्रेम की साच्ची बाणी बोल परी
दिल्ली के म्हं जाता दिखै यो ताराचन्द का ऊठ थड़ा।।

रागनी-5
टापू के म्हा छोड़ डिगरग्या, के गलती थी मेरी।
पिया जी साच बता या, क्यूं खेली हथफेरी।।

तनै कुछ तै कहकै जाणा था, इस रंज नै घणी खाई,
पणमेसर का दर्जा समझकै, साथ तेरे मै आई,
कोये ना आड़ै खसम गुसांई, मैं कितणा दुख खेरी।।

हारी थकी थी जाण पटी ना, सांझै पड़कै सो ली,
कितै भी तू पाया कोन्या, तड़कै आँख जब खोली,
मैं रो रो कै पागल सी हो ली, मोहनमाला भी तोड़ बगाई।।

माँ बाप नै चाह मै भरकै, तेरे गैल खंदादी, ,
जवान बहु छोड़कै करदी, जिंदगी की बरबादी,
तेरै तै कुछ गमी ना शादी, मेरी करग्या ढेरी।।

टापू के म्हा एकली रोऊं, कित मरूं टक्कर मारकै,
सेठ के बेटे बता के मिलग्या, ब्याही पै कष्ट डारकै,
मेहर सिंह नै बख्त बिचारकै, माला माल्यक की टेरी।।

किस्सा-चंद किरण

तलै महल कै दूर सड़क तै रूकके दे री खड़ी खड़ी
फोटू ले लो फोटू ले लो न्यू कानां मैं भनक पड़ी

इक फोटू पै शिबजी भोला पार्वती भी गैल रही
एक फोटू पै पूर्णमल नूणादे भी खड़ी सही
एक फोटू पै हरिश्चन्द्र लाला कै रहे खुलवा बही
एक फोटू पै नल-दमयन्ती जित देवतां नै बात कही
एक फोटू पै पांचो देवता इन्द्र बरसै लगा झड़ी।

एक फोटू था राधा कृष्ण का फोटू खास दिख्या राख्या
एक फोटू पै गोपनियां में करता रास दिख्या राख्या
एक फोटू पै कंस पापी का करता नाश दिख्या राख्या
एक फोटू पै राजा रामचन्द्र कै हनमत पास दिख्या राख्या
एक फोटू पै राजा रावण जित सीताजी गई हड़ी।

एक फोटू पै कैरूं पांडु खेल रहे चौपड़ सार
एक फोटू पै कर्ण बली महाभार में रहे ललकार
एक फोटू पै गुरू द्रोणाचार्य भीष्मजी भी करैं बिचार
एक फोटू पै कैरूआं की महाभारत में हो री हार
एक फोटू पै कांटा टंगरा कित पासंग कित एक धड़ी।

एक फोटू पै हूरे मेनका देवतां में रहने आली
एक फोटू पै हीर खड़ी एक पै बैठया रांझा पाली
एक फोटू पै बाग-बगीचे फूल सींच रहा था माली
एक फोटू पै चन्द किरण का मोटी आंख पूतली काली
जाट मेहर सिंह पागल होंगे जब फोटू में आंख लड़ी।

किस्सा-शाही लक्कड़हारा

रागनी-1

हे डूब कै मरज्या तनै कंगले तै मेल किया।
पहलम तैं मनै जाण नहीं थी तनै यो के अटखेल किया।

जबतै बात सुणी तेरी ना देही में बाकी सै
इसमै म्हारा दोष नहीं खुद तेरी नालाकी सै
ईब तलक हाथां पै राखी सै, क्यूं जिन्दगी का झेल किया।

बखत पड़े पै माणस हो सै अप अपणे दा का
बेरा ना यो कद दर्द मिटैगा इस गुप्ती घा का
तूं धृत दताया सर्राह गां का,शामिल क्यूं तेल किया।

जैसे जल बिन बरवा सूकै तूं भी इस तरियां सूकैगी
बात या मामूली कोन्या जिन्दगी भर दूखैगी
हमने या दुनिया के थूकैगी, यो नंग तेरी गेल किया।

मेहर सिंह कर भजन हरि का फेर दुनियां तै जाईये
दो रोटी का काम करे जा और तनै के चाहिये
गुरु लखमीचन्द तूं साच बताईये, यो छोरा क्यूं फेल किया।

रागनी-2

जुबान संभाल कै बोलिये टुक लोभीलाल बेईमान।
मैं कद की सुनूँ पिया मेरे नै तू लाग रह्या धमकान।।

(यह रागनी पूरी नही मिली)

किस्सा-पूरनमल

रागनी-1

मात पिता और कुटुम्ब कबीला सब झूठ जगत का नाता
उमर कैद हो माणस की मैं न्यूं ना ब्याह करवाता।टेक

शेष नाग भी जती रहा जो विष्णु का प्यारा था
एक बणया राम एक बणया लछमन जब मनूष्य रूप धारया था
चौदह साल जती रह कै नै मेघनाथ मार्या था
युद्ध कर कै नै ब्याही सुलोचना वो बदला तारया था
जती रह्या और असुर मार दिया ना तै खुद आपै मर जाता।

शील गंगे भी जती रहा जो भीष्म था ब्रह्मचारी
दुनिया कै म्हां रुका पड़ग्या पड़गी थी किलकारी
उतरान को प्राण गये हुई स्वर्ग लोक की त्यारी
अपणे हाथां मौत बता दी पड़े धरण बलकारी
बड़े देवता फूल बगावैं खुश हुई गंगे माता।

वो हनुमान भी जती रहा जो जन्म जती कहलाया
जुल्म हुया जब रोक सुरज लिया दिन ना लिकड़न पाया
एक हाथ पै पहाड़ उठा सजीवन बूटी ल्याया
सोने की लंका फूंक दी भारी जंग मचाया
हनुमान बिन इस दुनियां में लछमन नै कोण बचाता।

पुरनमल का दोष नहीं नूनादे तेरा ताली
पुरनमल नै जगत सराहवै नूनां नै दे गाली
जो मां बेटे पै जुल्म करै वा मां हो सै चन्डाली
पुर्शामल का जिक्र सुणो जिस नै 360 सगाई टाली
स्वर्ग नरक का पता उड़ै जड़ै छन्द मेहरसिंह गाता।

रागनी-2

मेरे पिता कै ब्याही आरी मेरी लगे धर्म की माता
कदे दुनिया मै देख्या सुणया ना जूणसा तू चाहैव नाता

(तीन कली नहीं मिली)

भौरे मै रहै कै सीखे कोन्या मनै इश्क के राग
काम नशे मै सोवै मतन्या सोधी कर माँ जाग
मैं तेरी बहा न का जाया री क्यूँ फोडै मेरे भाग
वो पाणी पूर्ण प कोन्या जिस तै बूझै तेरी आग
जाट मेहर सिंह बरोने आला अनूठे छंद कथ गाता

किस्सा-महाभारत

घरां बिराणै लड़न लागगी तनै कती करी ना सोधी
कर कै नेत्र लाल द्रोपद बात कह मत बोदी।टेक

आज पति नै शाल बतावै तनै कती शर्म ना आई
उस दिन नै गई भूल द्रोपद चीर बांध कै ब्याही
दुर्योधन को अन्धा कैह कै पाणी में आग लगाई
तेरे कारण पांचों पांडों भरते फिरै तवाई
करी जेठ संग तनै अंघाई या तै इज्जत म्हारी खो दी।

दुर्योधन कै ताना मार्या कैहकै कड़वा बोल परी
मन मैं जाल जूए का बण कै कर दिया बिस्तर गोल परी
शकुनि धोरै धर्मराज की खुलवा दी कती पोल परी
उसी तरह से आज मेरा तूं रही कालजा छोल परी
ईब दिखा द्यूं खोल परी जो या बेल नाश की बो दी।

कस कस ताने मत मारै ना बोल सह्या जावैगा
जिस नै कैह सैं आज हिजड़ा वो रण मैं धूम मचावैगा
धनुष बाण ले अपने कर तै शीश काट कै ल्यावैगा
पहल्यां केश धुलां दे तेरे फेर बेटे ने ब्याहवैगा
आकै तनै दिखावैगा थारी कितनी खाली गोदी।

बिगड़ी मैं ज्ञानी माणस भी मुर्ख पै कान कटा ले
कैह कै कड़वे बोल द्रोपद अपणी हवस मिटा ले
टैम आए पै तनै दिखा द्यू बाणैं सैकड़ों साले
लखमीचन्द की कृपा तै तू काट जाप के ना ले
जाट मेहर सिंह औम मना ले या तै रांड़ भतेरी झोदी।

किस्सा-नौटंकी

रागनी-1

छोह डट रह्या ना गात का , तोड़ हो लिया बात का ,
परी नौटंकी के हाथ का, इब पीना स पाणी।।

(तीन कली नही मिली)

यारां संग लूटी भतेरी आनंदी
सुननी भी पड़ी ओछी मंदी
पाबंदी मेहर सिंह प लाई, ईश्वर नै कर दी मनचाही,
रच दी अनूठी कविताई , मेरी याहे राम कहानी।।

रागनी-2

जाणे वाले चले गये मेरै उठै लौर बदन के म्हां
तेरे ऊपर मुश्ताक रहूं बणी बिजली घन के म्हां।टेक

मैं भाभी तूं देवर चाहिये ना हो तकरार जले
मेरी तेरी सुण कै लड़ाई हंसैगे न्यू नरनार जले
मेरी करदे माफ खता मैं रह लूंगी ताबेदार जले
के जिक्र एक ब्याह का मैं करवा द्यूं दो चार जले
परी पदमनी ब्याह द्यूंगी म्हारै घाटा कोन्या धन के म्हां

देवर भाभी का हुआ करै घर मैं घना मजाक जले
तूं एक बोल म्हं छोह म्हं भरग्या क्यूं हो रह्या सै राख जले
समझदार तूं स्याणा सै मैं तेरी भाभी नालायक जले
तेरी ओड़ की मेरे दिल मैं सै महोब्बत पाक जले
मैं बाहर रहूं तूं भीतर रहिये करिये मौज भवन के म्हां।

दो बासण जब आपस म्हं भिड़ज्यां होज्या घर म्हं राड जले
सिर म्हं जूत मारले बेसक मैं पकड़ा द्यूंगी झाड़ जले
तनै तेग सूत कै पकड़ा द्यूंगी चाहे तारले नाड़ जले
क्यूंकर दिल तैं दूर करूं मनैं छोटे से के करे थे लाड़ जले
मैं हांसी ठट्ठा कर रही थी तू बुरा मान ग्या मन के म्हां।

तूं छोटा मैं बड़ी तेरे तैं ले मेरी बात नै मान जले
जोश जवानी का चढ़ रह्या सै नहीं ठीकाणै ध्यान जले
बिना गुरु के मेहरसिंह नै नहीं मिल्या था ज्ञान जले
कहे सुणे बिन सरै नहीं तेरी छोटी उम्र नादान जले
फौजी के म्हां करै नौकरी तूं रहता रोज चमन के म्हां।

रागनी-3

आधी उम्र बाप कै खो दी के जिन्दगानी लेहरी
बिन बालम तेरी उम्र कटै ना या अरजी सै मेरी।टेक

जिस बन्दे के भाग फूटज्यां, जा सांड शेर कै आगै
बिन परां का मन पंछी सै जी चाहवै जित भागै
भजन का करणा पार उतरणा जो बूरे काम नै त्यागै
जैसे कर्म करैगा बन्दे वैसे आज्यांगे तेरे आगै
तू खड़ी ठाण पै भूण्डी लागै बिन असवार बछेरी।

जै किमै ऊक चूक होगी तो होज्यागा मुंह काला
दुनियां के म्हां बांस उठज्या होज्या जातक बाला
शीशे कैसा यो पाणी सै बिल्कुल ठीक बिचाला
तेरी श्यान नै देख कै माणस खाकै पड़ै तिवाला
तेरे नाम की फेरूं माला तू गंगा पर की ढेरी।

उस माणस नैं किसका डर जो प्रेम का लाड्डू बांटै
पीहर के म्हां पड़े रहण तैं यो किसका पूरा पाटै
पीहर के म्हां पड़ी रहै सै गुण औगुण नै छांटै
पति बिना या उमर कटे नां क्यों शादी नैं नाटै
तूं क्युंकर दिल नै डाटै या हद छाती सै तेरी।

उसका होज्या सुरग म्हं बासा जिस छैल गेल्यां जागी
बिजली जैसे चमके लागैं जब मटना मल कै न्हागी
कोयल तै भी मीठा बोलै चूंट कालजा खागी
नरक सुरग का बेरा पटज्या जब हंस हंसकै बतलागी
कहै मेहरसिंह गस आगी मनैं जब आंख्या की ली फेरी।

किस्सा-हीर-राँझा

रागनी-1

कहां हैं वो वादे महोब्बत,कहां है प्यार की कसम
अ-बेवफा क्यूं की ये जफ़ा,पूछे मेरे आब-ए-चश्म

नूर तेरे चेहरे का ज्यूं संदली अब्रू-ए-फलक
बर्दाश्त नही होता करें मेरे कल्ब को भस्म

ये तेरी चालाकी थी या तूं है इतनी अबल्ही
जो चली बन खानूम अटखेड़ा किया काना खसम

अरे क्यूं करती है अफ़सोस और इलहाहोजारी
मुझे मयस्सर किया दोजग,तूने अदा करके निकाह रस्म

सही जाए ना तेरी ओबाशी ओर इंफिसाख
मेहर सिंह मरना घुट-घुट के और रगड़ के पश्म

रागनी-2

के बुझैगा नाथ जी मेरी माया लुटगी।टेक

लरजे ज्यौं पाणी हिलै डोल मैं
मीठी थी कोयल केसी बोल मैं
थी पन्द्रह सेर की तोल मैं आज पोने दो सेर घटगी।

उठी घटा घनघोर थी
सामण केसी लोर थी
रेशम केसी डोर थी, आज हाथां तै छुटगी।

खाती की लाकड़ी स्याली ओड़
नयन मारे की ना जा खाली ओड़
जंगशाला तै चाली ओड़ बादली जा अटखेड़ा डटगी।

मेहर सिंह का छन्द जड़या हुया
किसै कारीगर का घड़या हुया
गंडासा रेत में पड्या हुया न्यूं सानी की कटगी।

किस्सा-कृष्ण लीला

कृष्ण माटी खाण की तू पड़ग्या बाण कसूती

धमका के यशोदा बोली लाग गया माटी खाण
गुजरी बतावैं सारी पाट लई मनै जाण
पिट्टे बिना छोड़ू कोन्या पाड़ लुंगी दोनूं कान
काला बोल्या कोन्या खाता साफ साफ गया नाट
होंठा ऊपर माटी लागी जीभ तै रहा था चाट
तीन जन्म का योगी था वो धारण लागा रूप विराट
वे सारी सै मेरी जाण्य की कति दोगली दूती

सामने यशोदा खड़ी कृष्ण रहा मुह नै पाड़
सचमेरू और मारकंडे छोटे बड़े दिखै पहाड़
बाग बगीचे जल थल जंगल किते किते कै पड़ी उजाड़
सारी सृष्टि मुंह के अंदर दुनिया करती खेती क्यारी
अड़सठ तीर्थ सात समुंदर धार बहै थी न्यारी न्यारी
ओम नाम का जाप होवैं थे, मंदिरों में यज्ञ करैं पुजारी
दिन लिकडे ओर छिपाण की किते दिखे प्रजा सूती

धरती और आसमान दिखै तीन लोक न्यारे न्यारे
सात द्वीप नौ खण्ड दिखै शेषनाग भी आसन ला रे
सूरज और चन्दा दोनो भू मंडल के नौ लख तारे
ऋषि मुनि तप करे योग से कपाली खीच
बारा पंथ साधुओं के भक्ति करते आंख मीच
धर्मराज न्याय करै छांट रहे ऊंच नीच
आग दिखै थी शमशाण की कितै अंग में रमा रहे भभूति

राजा की लड़ाई बाजै खून से होई धरती लाल
बावन भैरव छप्पन कल्वे चोसठ जोगन ठोकै ताल
यमराज दिखाई देता साथ मै खड़ा है काल
कृष्ण जी के मुह मै देखा यशोदा ने रूप वीराट
शेर ओर बकरी दोनूं दिखै पानी पी ते एक घाट
जाट मेहर सिंह मुह के अंदर चौरासी के दिखै ठाट
मत बात करो अभिमान की सब जीव काल की जूती

किस्सा-हरनंदी का भात

ग्यारा करोड़ की ग्यारा धजा थी फरकैं करैं थी चुबारै रै
तनैं जब क्यूं ना भात भराया मन्शा ईब क्यूं बोली मारै रै।टेक

हरनन्दी थी जेठी बेटी सेठाणी नै जाई थी
भागमल पिता मरण लग्या जब माया भी बंटवाई थी
तेतीस करोड़ नकद रोकड़ा भाईयां नै गिणवाई थी
मनशाराम इब गलत टेम पै तनैं कति शर्म ना आई थी
मेरी बदनामी का ढोल बाजज्या जाण पाटज्या सारै रै।

कृष्ण जी का सेवक बणकै बहोत घणा पछताया था
गंगा जी पै न्हाण गया तनैं छलिया रूप दिखाया था
ब्राह्मणं बणं कै दक्षिणा मांगै मांग मांगने आया था
मैं नाट गया जब कृष्ण जी बहोत घणा छौह म्हं आया था
मेरी मस्क बांध चिता म्हं धरदी क्यूं हाथ पसारै रै।

भगत जगत का बैर दुनिया म्हं प्रजा कहती आवै सै
तूं समधी होकै ईज्जत तारै ईब मनैं क्यू आजमावै सै
सोने चांदी के लिख कै पत्र मेरे धारै भिजवावै सै
मेरा अन्त टेम मांग कै खाता क्यूं मेरी बेइज्जती करवावै सै
तूं कितका रिश्तेदार बण्या जब आब सग्यां की तारै रै।

कृष्ण जी के कहणे तै सब माया धर्म म्हं लाई थी
गंगा जी पै न्हाण गया उड़ै गैल सेठाणी आई थी
कृष्ण जी नै रूप बदल कै सेठां की रजत अजमाई थी
मेहर सिंह कहै या करनी नौकरी लिखी कर्म मैं पाई थी
हरी करैंगे तो भात भरैंगे आके तेरे द्वारै रै।